काइजेन क्या है, इससे लक्ष्य प्राप्त कैसे करें | Kaizen technique in hindi for work

काइजेन क्या है, इससे लक्ष्य प्राप्त कैसे करें | Kaizen technique in hindi for work


काइजेन क्या है, इससे लक्ष्य प्राप्त कैसे करें | Kaizen technique in hindi for work


Kaizen technique in hindi for work


मान लीजिए आप किसी ऐसे देश में रहते हैं जिसका आकार भारत के 1/9 भाग के बराबर है। जहां भारत की जनसंख्या 130 करोड़ है वहीं इस नए देश की जनसंख्या 10 करोड़ की है। यह एक ऐसा देश है जहां हर 3 साल में भूकंप या सुनामी आता ही है आपको क्या लगता है अगर आप इस देश में रह रहे होते तो इस देश के ग्रो होने के कितने चांसेस थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इस देश पर दो परमाणु बम फेंके गए जिसके कारण इस देश की इकोनॉमी पूरी तरह से तबाह हो गई शायद आपको अंदाजा लग रहा होगा कि यहां जापान की बात हो रही है।


अब सवाल ये है कि यहां के लोग ऐसी कौन सी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं जिससे यह लोग इतनी जल्दी ग्रो हो गए। इस टेक्निक का नाम है Kaizen. और इस पोस्ट में आज हम यही जानेंगे कि kaizen क्या है और इससे हम कैसे अपने बिजनेस में, पढ़ाई में, और अपनी हेल्थ, ओर साइकोलॉजी को इंप्रूव करने के लिए इसे कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं।


काइजेन क्या है, kaizen का मतलब?


Kaizen दो शब्दों से मिलकर बना है kai+zen यह जापानी शब्द है। जिनका मतलब change+good होता है इसका मतलब होता है अच्छे के लिए किया गया बदलाव

Kaizen कहता है कि अपने गोल को प्राप्त करने के लिए उसे इतने छोटे टुकड़ों में इतने Action's में तोड़ दो कि हम किसी भी कार्य को करने के लिए बहुत जल्दी action ले लें ओर हमारी उस काम को करने की productivity बढ़ जाये और time waste में कमी हो। 

अब हम में से कई लोग यह सोच रहे होंगे कि यह क्या?.. तो चलिए देखते हैं कि जब इस तकनीक का प्रयोग अलग-अलग फील्ड में किया गया तो उन्हें कितनी इंप्रूवमेंट हुई।


तो सबसे पहले आता है Kaizen in medical sciences


1700 वी सदी में जब भी लोगों को स्मॉल पॉक्स(छोटी माता) की बीमारी होती थी तो एक साथ तीन चार लाख लोग मर जाते थे। लेकिन आजकल हम ऐसी छोटी बीमारियों की परवाह भी नहीं करते क्योंकि 1796 एडवर्ड जेनर ने मेडिकल साइंसेज में काइज़ेन के सिद्धांत को इस्तेमाल किया था उन्होंने स्मॉल पॉक्स की वैक्सीनेशन तैयार की। यह वैक्सीनेशन वही माइक्रो ऑर्गेनाइज्म है जो अगर हमारी बॉडी में घुल जाए तो यह हमें मार भी सकते हैं लेकिन बहुत ही छोटी मात्रा में अगर हम यह किसी को दे दें तो उसका इम्यून सिस्टम मजबूत हो जाता है। अगर भविष्य में कभी  माइक्रो ऑर्गेनाइज्म हमारी बॉडी में घुस जाए तो हमारा इम्मयून सिस्टम इसे आसानी से मार सकता है यानी काइज़ेन की वजह से मेडिकल साइंसेस में भी काफी इंप्रूवमेंट हुए हैं।


Kaizen for health


हेल्थ में kaizen कितना प्रभावी है यह जानने के लिए रिसर्च ने एक एक्सपेरिमेंट किया रिसर्च एक ऊंची बिल्डिंग में गए उस पर 7th फ्लोर पर जो लोग काम कर रहे थे उनसे मिले उस फ्लोर के एंप्लॉय एक्सरसाइज नहीं करते थे और इन्होंने जिंदगी में अगर कभी एक्सरसाइज की भी थी तो वह सिर्फ दूसरों के दबाव में आकर की थी। सबसे पहले रिसर्चर ने इन लोगों को अच्छी हेल्थ के लाभ के बारे में बताया और यह बताया कि हमें हर हफ्ते कम से कम तीन से चार बार एक्सरसाइज करनी चाहिए और वह भी 30 से 40 मिनट फिर इन्हें हेल्थ क्लब में फ्री की मेंबरशिप भी दी गई इन्हें फ्री क्लॉथ और फ्री ट्रेनर के लिए गिफ्ट सर्टिफिकेट भी दिए गए ताकि यह एक्सरसाइज करने के लिए मोटिवेटेड रहे।


इसके बाद रिसर्चर 11th फ्लोर पर गए और वहां पर काम कर रहे कर्मचारियों से मिले यहां के कर्मचारी भी एक्सरसाइज नहीं करते थे यहां के कर्मचारियों को भी हेल्थ के लाभ के बारे में बताया लेकिन इन्हें फ्री जिम मेंबरशिप नहीं दी गई बल्कि इन्हें बोला गया कि आपको हर रोज ऊपर वाले फ्लोर में लंच के बाद सीढ़ियां चढ़कर जाना है और फिर वापस आकर अपने काम पर लग जाना है उसके अगले दिन फिर यही करना है और एक सीढ़ी अधिक चढ़नी है और वापस आकर अपने काम पर लग जाना है और इस प्रोसेस को कंटीन्यू रखना है।


जब रिसर्चर 1 साल बाद वहां पर आए तो उन्होंने देखा जिन लोगों को सीढ़ी चढ़ने को बोला था उनकी हेल्थ काफी अच्छी थी उन लोगों से जिनको फ्री जिम मेंबरशिप दी गई थी। इस एक्सपेरिमेंट को अलग-अलग जगह रिपीट किया गया तो हर बार रिजल्ट एक जैसे ही रहे मतलब आपके द्वारा उठाया गया एक छोटा कदम आपको बेहतर रिजल्ट देता है।


Kaizen for Administration


कार एक्सीडेंट की वजह से काफी जाने जा रही थी इसलिए इसे कम करने के लिए रिसर्चर ने एक एक्सपेरिमेंट किया जिसमें kaizen technique का इस्तेमाल किया गया उन्होंने शहर में ऐसे लोगों को ढूंढा जो काफी चीजों में एक जैसे ही थे जैसे मंथली इनकम, नंबर ऑफ चिल्ड्रन, एजुकेशन आदी उन्होंने इन लोगों को दो ग्रुप में डिवाइड किया ग्रुप ए और ग्रुप बी।


ग्रुप ए के साथ पहले 2 हफ्ते में कुछ भी नहीं किया गया लेकिन रिसर्चर वॉलिंटियर बनकर ग्रुप बी के घरों में एक-एक करके गए और उनसे कहा गया की यूनाइटेड स्टेट में हर साल 40000 लोग कार एक्सीडेंट में मर रहे हैं तो क्या आप यह छोटा 3×3 इंच का स्टीकर आपकी विंडो में लगाने देंगे और उस स्टीकर में लिखा था “ बी ए सेफ ड्राइव ” ओर रिसर्चर ने लोगों से कहा कि स्टीकर की वजह से काफी लोग गाड़ी धीरे चलाएंगे ग्रुप बी के अधिकतर लोगों ने इस छोटी सी रिक्वेस्ट के लिए हां कह दी।


2 हफ्ते बाद रिसर्चर ग्रुप ए के घरों में गए और उनसे भी वही बात की कि हर साल अमेरिका में 40000 से ज्यादा लोग कार एक्सीडेंट की वजह से मर रहे तो क्या आप यह बिलबोर्ड आपके लोन में लगाने की परमिशन देंगे और इस बिल बोर्ड की फोटो उन्होंने फैमिली मेंबर्स को दिखाइ जो कि बहुत ही बड़ा और भद्दा बिलबोर्ड था और उस पर लिखा था बी ऐ सेफ ड्राइव और यही चीज ग्रुप बी के फैमिली मेंबर्स के साथ भी की गई लेकिन ग्रुप ऐ की 17% फैमिली ही अपने घरों के आगे बिलबोर्ड लगाने को तैयार हुए जबकि ग्रुप बी के 75% फैमिली वही भद्दा बड़ा सा बिलबोर्ड लगाने के लिए तैयार हो गये और यह इसलिए हुआ क्योंकि 2 हफ्ते पहले इन्हीं लोगों को 3×3 इंच का छोटा सा स्टीकर लगाने लगाने को कहा गया था।

यानी जब हम शुरू में एक छोटा कदम उठाते हैं तो हमारे लिए बड़े लक्ष्य प्राप्त करना आसान हो जाता


Ask small questions kaizen questions


हमारा दिमाग कंप्यूटर से कई चीजों में काफी अलग है उदाहरण के लिए अगर आप कंप्यूटर को खुद को प्रिंट करने की कमांड दो तो उसमें Error आएगा। क्योंकि उसके पास इसके लिए कोई सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर नहीं है लेकिन हमारा दिमाग ऐसा नहीं करता है अगर हम अपने दिमाग से कोई सवाल पूछते हैं तो उसे यह लगता है कि यह चीज इंपोर्टेंट है और वह उसका जवाब ढूंढने में लग जाता है उदाहरण के लिए अगर मैं आपसे कहूं कि आपके सामने वाले पड़ोसी की कार का नंबर क्या है? तो हमें पता नहीं होगा और ना ही हम परवाह करेंगे लेकिन अगर कल फिर मैं आपसे पूछूं कि आपके पड़ोसी की कार का नंबर क्या है तो हो सकता है कि आप इसे फिर से इग्नोर कर देंगे लेकिन फिर से मैं आपसे इसे तीन चार बार पूछ रहा हूं तो अगली बार आपका दिमाग आपकी पड़ोसी की कार को देखेगा और अगर उस वक्त आपको कोई इंपोर्टेंट काम भी होगा तो तो भी आपका दिमाग उसे छोड़कर आपके पड़ोसी की कार के नंबर को स्टोर करने लगेगा कहने का मतलब यह है कि हमारा दिमाग किसी भी सवाल को रिजेक्ट नहीं कर सकता।


इसीलिए अगर हम बार-बार खुद से यह सवाल पूछते रहेंगे कि मैं ऐसा क्यों हूं.. मैं इतना बड़ा लूजर क्यों हूं?.. मैं ऐसा क्यों करता हूं.. मेरे मैं इतनी प्रॉब्लम क्यों हैं?, हर आदमी मेरे अलावा खुश क्यों है..? मैं इतना बड़ा गधा क्यों हूं...? अब हमारा दिमाग हमसे यह सब नही कहेगा क्योंकि ऐसे सवाल तो कोई अपने दुश्मन से भी नहीं पूछेगा उनके दिमाग में ऐसा हिस्सा नहीं है इसलिए जब हम खुद से पूछेंगे कि मैं इतना बड़ा लूजर क्यों हूं तो हमारा ब्रेन हमसे करेगा कि जब तू 10 साल का था तो तूने अपनी दादी से बदतमीजी की थी इसलिए इतना बड़ा लूजर है जब 14 साल का था तो तू फेल हो गया था इसलिए इतना बड़ा लूजर है जब 16 साल का था तो घर से पैसे चुराए इसलिए इतना बड़ा लूजर है।


और जो मेमोरी हमने स्टोर करके रखी थी वही सब को जोड़कर हमारा दिमाग हमें जवाब देने लगता है तो अगर हम अपने सवाल बदल लेते हैं तो हमें बिल्कुल अलग जवाब मिलेंगे।


इस सिद्धांत को टोयोटा ने अपने बिजनेस में भी इंप्लीमेंट किया था द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद Edward Deming टोयोटा की मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस को इंप्रूव करने के लिए जापान आए इस वक्त टोयोटा की हालत बहुत बुरी थी E. Deming ने टोयोटा के कर्मचारियों को हर रोज सिर्फ एक आसान काम करने के लिए कहा सवाल यह था कि टोयोटा के कर्मचारियों को खुद से एक सवाल पूछना है की मैं आज ऐसा कौन सा काम कर सकता हूं जो फ्यूचर में टोयोटा की मदद कर सके उन्हें खुद से सिर्फ सवाल पूछाना था क्योंकि के E. Deming जानते थे कि इसका जवाब दिमाग खुद ही ढूंढ लेगा और जब टोयोटा के कर्मचारी इन छोटी-छोटी बातों से इंप्रूव होंगे तो यह कंपाउंड होकर अच्छे रिजल्ट देगा इसलिए टोयोटा जो कि एक फ्लॉप कंपनी थी आज दुनिया की बेस्ट कंपनी में से एक है और टोयोटा में यह परंपरा अभी तक चली आ रही है।


क्योंकि 1997 के डाटा के अनुसार अमेरिका के ऑटोमोबाइल के वर्कर्स 2 साल में अपनी कंपनी को इंप्रूव करने के लिए सिर्फ तीन Suggestions देते हैं जिनके जिसके लिए उन्हें हर Suggestions के 450 डॉलर मिलता है जबकि टोयोटा के वर्कर 1 साल में 200 Suggestions देते हैं उन्हें सिर्फ $3 डॉलर ही मिलते हैं यह कम रिवॉर्ड की वजह से टोयोटा के वर्कर्स छोटी-छोटी चीजों को भी इंपोर्टेंट मानते थे। और इसीलिए ज्यादा सजेशन देते हैं जबकि बाकी कंपनी जहां पर रिवार्ड बहुत बड़ा है मतलब जहां 450 डॉलर है वह इस रिवार्ड को पाने के लिए उन कंपनियों के कर्मचारियों को लगता है कि उनका आईडीया भी एक रिवॉल्यूशनरी आईडिया होना चाहिए और इसलिए वह छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान नहीं देते जिसकी वजह से वह कई समस्याओं को अपनी कंपनी में इंप्लीमेंट नहीं कर पाते।



● Kaizen की मदद से हम सबसे छोटे स्टेप को अमल में ला सकते हैं जिससे हम अपनी लाइफ को इंप्रूव कर सकते हैं यह छोटे कदम सुनने में तो बहुत ही छोटे लगते हैं लेकिन इनका प्रभाव बहुत बड़ा होता है क्योंकि कई दिन का क्योंकि Kaizen technique का सबसे जरूरी काम हमारे दिमाग से उस डर को हटाना है वह डर जब हमारे सामने बहुत बड़ा task होता है उसे हटाना।


● काइज़ेन टेक्निक को हम किसी भी फील्ड में अप्लाई कर सकते हैं जैसे हमारी आदत है कि हम बहुत ज्यादा खर्चा करते हैं इसके लिए Kaizen technique होगी कि हम शॉपिंग करते वक्त सिर्फ एक चीज कम खरीदें और अगर हमारा गोल है कि हम एक्सरसाइज करें तो हम पूरे दिन में टीवी पर एक एडवर्टाइजमेंट देखते समय थोड़ा बहुत चल सकते हैं अगर हमें अपना तनाव कम करना है तो हम उस तनाव के समय एक लंबी गहरी सांस ले सकते हैं अगर हमें घर साफ करना है तो हम 1 दिन 5 मिनट का अलार्म लगा कर रखें और उसमें जितना साफ हो सके सिर्फ उतना ही कर करें।


इस तरह हम अपने goal को पाने के लिए छोटे छोटे step लेकर आगे बढ़ते हुए अपने बड़े लक्ष्य को हासिल करते हैं 😊






Post a Comment

0 Comments