जादुई कढ़ाई – hindi moral story on jadui kadhai

जादुई कढ़ाई – hindi moral story on jadui kadhai

जादुई कढ़ाई - hindi moral story on jadui kadhai

“देखो राधा इस बार मैंने बहुत अलग तरह की मूर्तियां बनाई है देख कर लगता है कि यह सब बच्चों को बहुत पसंद आएगी”


“सच कहा मूर्तियां तो सच में बहुत सुंदर बनी है लगता है आज तो बाजार में हमारी सारी मूर्तियां बिक जाएंगी”


“हां मुझे भी यही लगता है”


“आज अगर बिक्री अच्छी तरह से हो गई तो मैं एक कढ़ाई खरीद लूंगी वह मेरी पुरानी कढ़ाई बिल्कुल खराब हो चुकी है”


“चिंता क्यों करती हो राधा हम कढ़ाई ही क्यों और भी बाकी सारे सामान खरीद लेंगे जिनकी हमें जरूरत है”


“बाकी सामान की मुझे जरूरत नहीं है मुझे तो बस एक कढ़ाई चाहिए ताकि उसमें मैं आपके लिए अच्छा सा खाना बनाकर आपको अच्छे से खिला सकूँ बस..”


“मेरी ऐसी किस्मत कहां राधा तुम तो अच्छे पकवान बना कर खिलाना चाहती हो लेकिन अच्छे पकवान बनाने के लिए अच्छा सामान भी तो होना चाहिए ना, अनाज, सब्जियां, मछली, दूध, यह सब तो में शायद कभी नहीं खरीद पाऊंगा ना”


“अरे ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं हम दोनों मिलकर खूब मेहनत करेंगे देखना एक दिन हमारे भी सारे दुख दूर हो जाएंगे”


( अगले दिन बाजार में)


“आइए आइए ऐसे खिलौने लाया हूं कि आप नजरें हटा नहीं पाएंगे…. रंग बिरंगे प्यारे खिलौने आईये आइए ले जाइए”


( शाम हो जाती है लेकिन एक भी खिलौना नहीं बिक पाता)


“आज तो एक भी खिलौना नहीं बिक पाया जी”


“मुझे लगता है मेरे बनाए नए खिलौने किसी को भी पसंद नहीं आये ”


“ऐसा कैसे हो सकता है जी… इतने सुंदर खिलौने आपने कितनी मेहनत से बनाए हैं”


“ऐसी बात नहीं है राधा मैंने सोचा था कि बिक्री अच्छी होगी तो मैं तुम्हारे लिए एक नहीं कढ़ाई खरीद लूंगा लेकिन कढ़ाई क्या आज तो चावल दाल भी नहीं खरीद पाएंगे”


“आप दुखी मत होइए जी आज खाना नहीं मिला तो क्या हुआ पेट भर कर पानी पी कर सो जाएंगे अब चलिए नहीं तो शाम हो जाएगी”


( वह दोनों बाजार से अपने घर की तरफ जाने लगते हैं रास्ते में उन्हें एक बूढ़ी औरत मिलती है जिसके पास एक कड़ाही रखी होती है वह कहती है)


“क्या हुआ बच्चों ऐसे देख कर क्यों चले जा रहे हो ऐसी चीज फिर कभी नहीं मिलेगी आओ आओ”


“अब आपसे क्या बताऊं माँजी आज सोचा था कि बाजार से एक कढ़ाई खरीद कर लौटूंगा”


“पर कढ़ाई खरीद नहीं पाए..! यही ना दुखी मत हो जाना बच्चा यह कढ़ाई ले जाओ”


“नहीं-नहीं बूढ़ी मां आज हम लोग कढ़ाई नहीं खरीद पाएंगे आज हम लोग के पास बिल्कुल भी पैसे नहीं है”


“जानती हूं.. जानती हूँ.. आज तुम लोगों की बिक्री नहीं हुई है तुम लोग के पास पैसे देने को नहीं है तुम यह कढ़ाई ऐसे ही ले जाओ”

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“आप हमें यह कढ़ाई बिना पैसों के ही दे देंगे?”


“किसने कहा मैं तुम्हें यह बिना पैसों के ही दे दूंगी तुम लोग अपने थैले से मुझे एक खिलौना दे जाओ और मैं तुम्हें कढ़ाई दे दूंगी बस”


“कैसी बात कर रही हो माँजी कहां मेरे खिलौने का मूल्य और कहां आपकी यह कढ़ाई का मूल्य”


“मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि कितनी मेहनत करके तुम यह खिलौने बनाते हो और मेहनत का मूल्य कभी भी पैसों से नहीं खरीदा जा सकता मेरा बेटा यह लो पकड़ो यह कढ़ाई अभी मुझे बहुत दूर जाना है मेरा बेटा यह लो यह कढ़ाई घर ले जाओ और जो मन करे वह बना कर खाओ ठीक है”


“आप बहुत अच्छी है बूढ़ी मां पर हमारे घर में तो चावल दाल सब्जियां कुछ भी नहीं है क्या बनाकर खाएंगे हम आप बताइए?”


“बोला तो मैंने जो आए मन में वही खाना बना कर खाओ बस तुम्हें बोलना है क्या मुझे खाना खाना है वही बन जाएगी वह कढ़ाई में जो भी मन करें वह बनाकर खा सकते हो और देखना खाना वैसा ही बन जाएगा समझ गए ठीक है चलती हूं”

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( अब वह दोनों पति-पत्नी घर पहुंचते हैं)


“सुनो माँजी ने जैसा कहा क्या वैसा खाना बन सकता है?”


“एक बार इस कढ़ाई को चूल्हे पर पर रख कर देख ही लेती हूं”


“पर खाली कढ़ाई को चूल्हे पर रखने से क्या फायदा? अगर मैं यह कहूं कि मेरा मन मछली खाने का है तो क्या यह कढ़ाई हमें मछली बना कर देगी?”


“देगी जी.. जरूर देगी बूढ़ी मां की बात याद नहीं है क्या?”


( उसकी पत्नी उस खाली कढ़ाई को चूल्हे पर रख देती है और कहती है)


“दे दो कढ़ाई वही पकवान जो खाना चाहे हम इंसान”


इसके बाद उस कढ़ाई में अपने आप मछली बन जाती है, पक जाती है।


“यह देखिए जी”


“अरे अरे यह कैसा चमत्कार है”


“मैंने आपसे कहा था ना कि बूढ़ी मां की कढ़ाई ऐसी वैसी कढ़ाई नहीं है जी यह तो एक जादुई कढ़ाई है”

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“यह मैं क्या देख रहा हूं आज से हमारे दुख के दिन खत्म हो गए राधा”


“हां जी हां यह सब उन बूढ़ी मां का आशीर्वाद है”


अगले दिन


“मैं क्या कह रहा हूं राधा सुबह से काम कर करके मुझे बहुत तेज भूख लग रही है”


“चावल तो बन गए हैं अब आप उसके साथ क्या खाएंगे बताइए अब तो हमारे पास जादुई कढ़ाई है”


“तो फिर समस्या क्या है आज कुछ मजेदार सब्जी बना दो ना कढ़ाई सही से काम कर रही है या नहीं यह जानने के लिए मन बहुत बेचैन होता जा रहा है”


“कढ़ाई अपना काम जरूर ठीक से करेगी”

दे दो दे दो कढ़ाई वह पकवान खाना चाहे जो हम इंसान.


कढ़ाई में एक बहुत अच्छी सी सब्जी बन जाती है


“हां बहुत अच्छी खुशबू आ रही है”


“सच में राधा कहीं ऐसी सुगंध सुनकर पड़ोसी दौड़ कर ना चले आए हा हा हा”


( उस कढ़ाई में पक रही सब्जी की सुगंध पड़ोसियों तक भी चली जाती है)


फिर पड़ोसी सोचते हैं कि राधा तो रोज नए नए पकवान बनाती है उनके तो खाने के लाले पड़े रहते हैं फिर यह रोज रोज नए पकवान कैसे बनाते हैं, उनके यहाँ तो रोज रोज ही नए पकवान बनते हैं चलो आज देख कर आते हैं कि उनके यहां से खुशबू कैसे आती है?

( उनके पड़ोसी उनके घर आते हैं)

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“अरे भूषण काम में बहुत व्यस्त हो यार”


“अरे भाई रवि आज अचानक मेरे घर पर तुम तो कभी नजर ही नहीं आते हो भाई”


“इसीलिए तो आज हम लोग चले आए”


“ऐसे समय पर आए हैं आप लोग अब तो हमारे घर खाना खाकर ही जाना होगा आपको”


“हां भाई रवि आज रात का खाना यहीं खा कर जाना”


“आजकल राधा इतने अच्छे पकवान बनाती है की सुगंध से ही हम अपना पेट भर लेते हैं”


“सुनिए आप लोग बातें कीजिए मैं अभी खाना बना कर लाती हूं”


“लगता है भूषण आजकल आमदनी तुम्हारी कुछ अच्छी हो गई है आखिर बात क्या है रोज रोज इतने अच्छे पकवान लाते कहां से हो भाई”


“सब ऊपर वाले की कृपा है भाई”


( फिर उसका पड़ोसी पास में बैठी अपनी पत्नी को इशारों में किचन में जाकर देखने को कहता है उसकी पत्नी किचन में जाकर देखती है कि राधा जादुई कढ़ाई में खीर जादू से पका लेती है और उसे पता चल जाता है कि राधा के पास जादुई कढ़ाई है और वह सोचती है कि आज रात में इस कढ़ाई को चुरा लूंगी)


रात हो जाने पर उनके पड़ोसी राधा के यहां चुपके से अंदर घुसते हैं और वह उस जादुई कढ़ाई को चुरा कर अपने घर ले जाते हैं।

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“अरे जल्दी खाना बनाओ मुझसे तो रहा नहीं जा रहा देखना है कैसे खाना बनता है जादुई कढ़ाई में”


“चूल्हा तो अभी जलाया है थोड़ा रुक तो जाओ”


“सिर्फ कढ़ाई चूल्हे पर चढ़ाने से कुछ थोड़ी होगा जो खाना है वह भी तो कहना होगा ना”


“सिर्फ वह कहने से कुछ नहीं होगा साथ में एक मंत्र भी पढ़ना होगा वह भी मैंने सीख लिया है”


“तो फिर मंत्र पढ़कर बनाओ जरा बकरे का मांस”


“अब बकरे का मांस खाऊंगी बकरे का… दे दो कढ़ाई.. और क्या कहा था… यह ले लो.. दे दो… बहा दो… अरे याद नहीं आ रहा मुझे, अरे अरे याद आ गया, याद आ गया भर भर के, भर भर के, भर भर के याद आ गया मुझे”


वह दोनों पति-पत्नी उन पड़ोसियों की खिड़की से झांक कर देखते हैं कि उनकी कढ़ाई चुराकर वह खाना बना रहे हैं।


“पर मंत्र तो गलत पढ़ रहे हैं क्या गलत मंत्र से कढ़ाई में खाना बन पाएगा”


 “अरे सुधा इस कड़ाई में कुछ भी तो नहीं पक पा रहा है”


“अरे थोड़ा रुको तो मैं मंत्र पढ़ तो रही हूं… दे दो कडाई दे दो हमें पकवान भर भर के भर भर के”


फिर उस कढ़ाई में अचानक से इतनी सब्जी बन जाती है कि वह कड़ाई से नीचे गिरने लगती है कढ़ाई पूरी भर जाती है और धीरे-धीरे उनका पूरा घर सब्जी से भर जाता है उस सब्जी की बाढ़ आ जाती है और वह दोनों पति-पत्नी जो सब्जी बना रहे थे उस में बह जाते हैं।


फिर राधा और उसका पति जब अपने पड़ोसियों की यह हरकत देखते हैं तो राधा कहती है


“गलत मंत्र पढ़कर अपने विनाश को खुद ही बुला लिया इन दोनों ने”


“राधा यह तो होना ही था क्योंकि लालच का फल तो हमेशा बुरा होता ही है!”


कहानी से मिली सीख


हमें कभी भी किसी की चीज चुराना नहीं चाहिए और ना ही कभी लालच करना चाहिए क्योंकि लालच का फल बहुत बुरा होता है और चोरी की हुई कोई भी वस्तु हमें कभी भी सुख नहीं दे सकती!

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