स्वावलंबन पर हिंदी कहानी राजा और मंत्री - Hindi moral story on Self-reliance

स्वावलंबन पर हिंदी कहानी राजा और मंत्री - Hindi moral story on Self-reliance


स्वावलंबन पर हिंदी कहानी राजा और मंत्री - Hindi moral story on Self-reliance

स्वावलंबन पर हिंदी कहानी राजा और मंत्री


एक बार एक राजा हमीरगढ़ राज्य के थे, हमीरगढ़ के राजा बड़े वीर तथा प्रजा पालक थे ओर उनके मंत्री दूरदर्शी थे मंत्री की राज्य व्यवस्था कुछ ऐसी थी की प्रजा बड़े चैन से रह रही थी। शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते थे अन्याय का कहीं नामोनिशान नहीं था राजा की वीरता की धाक चारों ओर फैली थी शत्रु उसका नाम सुनकर ही कांप उठते थे लेकिन मंत्री के चेहरे पर हमेशा चिंता की लकीरें रहती थी।


कुछ दिन बाद हमीरगढ़ राज्य में एक डाकू ने आतंक फैलाना शुरू कर दिया, प्रजा में सब बेचैन रहने लगे इससे मंत्री की चिंता और बढ़ गई मंत्री ने जगह-जगह सैनिक तैनात कर दिए परंतु डाकू बहुत चालाक था वह आज यहां डाका डालते तो 4 दिन बाद कहीं कोसों दूर जाकर डालता वह अपने साथियों के साथ भूत की तरह आता और आनन-फानन में लूटपाट करके पलक झपकते ही भाग जाता। राजा ने जब यह बात सुनी तो वह भी बहुत चिंतित हो गए उन्होंने मंत्री को बुलाया और डाकू के आतंक को खत्म करने का आदेश दिया।


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लेकिन एक दिन तो डाकू ने कमाल ही कर दिया राज महल के ठीक सामने एक साहूकार के यहाँ उसने  डाका डाला जब तक वहां सैनिक पहुंचे तब तक तो डाकू नौ दो ग्यारह हो गए थे यह देख राजधानी में भी जगह-जगह सैनिक तैनात कर दिए गए थे लेकिन अगले दिन ही उसने एक और साहूकार के यहां डाका डाला इस बात से राजा और चिंतित हो गए उन्होंने मंत्री को आज्ञा दी कि जैसे भी हो डाकू को पकड़ा जाए मंत्री ने पहरा और भी अधिक बढ़ा दिया था।


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कुछ दिन तो शांति रही परंतु 1 दिन डाकू ने जब रात में चार जगह डाके डाले तो प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गई यह देख मंत्री ने गांव के हर व्यक्ति को अपनी रक्षा खुद करने की ट्रेनिंग दी। हर एक व्यक्ति को एक सैनिक की तरह तैयार किया गया अब गांव वालों के अंदर एक अजीब तरह का साहस आ गया था वह लोग अब बारी बारी पहरा देते ओर गश्त लगाते थे कुछ दिन तक लूटपाट की कोई भी घटना नहीं हुई लोगों ने समझा कि डाकू अब डर गए हैं लेकिन यह उनका भ्रम था तभी गांव में एक जगह डाका पड़ गया और गांव वालों ने डाकुओं को घेर लिया और पकड़ लिया डाकू ने बहुत बचना चाहा लेकिन गांव वालों के घेराव को देखकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया गांव वालों ने उन्हें रस्सी से जकड़ लिया और राजा के दरबार में ले गए जब राजा को पता चला कि डाकुओं को पकड़ लिया गया है तब उन्होंने चैन की सांस ली फिर राजा ने सोचा मंत्री ने आखिर डाकुओं को पकड़ ही लिया।


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अगले दिन दरबार में डाकुओं को देखने भीड़ उमड़ पड़ी रस्सियों से जकड़े डाकू दरबार में लाए गए डाकुओं के सरदार का चेहरा देखकर सभी लोग चौक गए राजा का चेहरा भी क्रोध से तमतमा उठा और बोले; तुम! नीच कपटी... डाकुओं के सरदार के भेष में मंत्री का चेहरा देखकर राजा आग बबूला हो गए और बोले तुम ने विश्वासघात किया है मंत्री तुम प्रजा के रक्षक नहीं भक्षक हो तुम्हें धन की जरूरत थी तुम मुझसे मांग लेते.. मंत्री चुपचाप राजा की बात सुनता रहा।


राजा का गुस्सा बढ़ता ही गया और वह बोले बोलो तुम्हें क्या दंड दिया जाए जनता भी क्रोध से आग बबूला हो गई और एक ही साथ कई लोग बोलने लगे; प्राण दंड महाराज.. प्राण दंड महाराज... मंत्री गद्दार है..!! मंत्री के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई मंत्री ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा मैंने जनता की भलाई के लिए ही यह सब स्वांग रचा है यदि मैं यह सब नहीं करता तो इनमें अपनी स्वयं की रक्षा करने की शक्ति कैसे आती।


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आप यह क्या कह रहे हैं मंत्री जी एक दरबारी ने हैरानी से पूछा.. फिर मंत्री बोला मैं सत्य कह रहा हूं बिना सैनिकों की सहायता से लोग चालाक डाकू को कैसे पकड़ पाते सभी गांव में सैनिक नहीं रखे जा सकते फिर यहां सैनिकों के भरोसे क्यों रहे? अपनी रक्षा स्वयं क्यों ना करें.. महाराज में अपने उद्देश्य में सफल हो गया अब हमीरगढ़ का प्रत्येक नौजवान सैनिक है अब हमारी तरफ कोई आंख उठा कर भी नहीं देख सकता अब आप जो भी दंड देंगे वह मुझे स्वीकार होगा।


राजा ने मंत्री को गले लगा लिया सब लोग मंत्री की जय जय कार करने लगे..।


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