राजा और उसका अशांत मन हिंदी कहानी | hindi story on disturbed mind

राजा और उसका अशांत मन हिंदी कहानी | hindi story on disturbed mind


राजा और उसका अशांत मन हिंदी कहानी | hindi story on disturbed mind


एक बार एक राजा होता है। जिसका मन बहुत अशांत रहता है वह कई प्रयत्नों के बाद भी अपने मन को शांत नहीं कर पा रहा था। वह अपने महल में बड़े-बड़े विद्वानों को बुलाता है और उनसे उपाय पूछता है सभी लोग कई उपाय बताते हैं लेकिन कोई उपाय काम नहीं करता। एक दिन एक व्यक्ति राजा के पास आता है और उनसे कहता है कि आपके मन को शांत करने का उपाय मेरे पास है राजा उस व्यक्ति की बात सुनकर बहुत खुश होता है और उस व्यक्ति से कहता है;


“अगर तुमने मेरा मन शांत कर दिया तो मैं तुम्हें उतना धन दूंगा जितना तुम मुझसे मांगोगे”


वह व्यक्ति राजा से कहता है - “आपका मन तो मैं शांत नहीं कर सकता लेकिन एक सन्यासी है जो तुम्हारा मन शांत कर सकता है वह कोई आम सन्यासी नहीं है वह एक प्रसिद्ध सन्यासी है आप उनसे एक बार जरूर मिले वह आपकी समस्या का समाधान जरूर कर देंगे”


राजा व्यक्ति से कहता है - “कहां मिलेगा यह सन्यासी?”


वह व्यक्ति राजा से कहता है - “यहां से कुछ दूर जंगल में उसकी एक छोटी सी कुटिया है”


राजा अपने कुछ सैनिकों के साथ उस सन्यासी के पास पहुंचता है और उस बौद्ध भिक्षु से कहता है - “मैंने सुना है आप बहुत पहुंचे हुए सन्यासी हैं”


बौद्धभिक्षु राजा को अनदेखा कर देते हैं राजा सोचते हैं कि शायद बौद्धभिक्षु ने मुझे सुना नहीं राजा फिर कहते हैं कि मैंने सुना है कि आप बहुत पहुंचे हुए सन्यासी हैं क्या आप मेरी समस्या का समाधान कर सकते हैं?


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बौद्धभिक्षु राजा के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देते और राजा मन ही मन सोचता है कि बौद्धभिक्षु उसे कोई उत्तर क्यों नहीं दे रहे अब राजा सीधे मुद्दे की बात पर आता है।


बौद्धभिक्षु से राजा पूछता है - “क्या आप मेरे मन को शांत कर सकते हैं? ” 


बौद्धभिक्षु मुस्कुराते हुए कहते हैं - “तुम्हारा मन अशांत क्यों है?”


राजा कहता है - “वैसे तो मेरे पास किसी चीज की कोई कमी नहीं है धन मेरे पास इतना है जिसकी कोई कमी नहीं सभी सुख सुविधाएं हैं, लोगों के मन में मेरे लिए आदर हैं, मैंने बहुत सारे दान पुण्य भी किए पर एक चीज की कमी है मेरे अंदर मेरा मन अशांत रहता है। लेकिन अगर यह कभी-कभी शांत हो भी जाता है तो यह फिर से अशांत हो जाता है। क्या आप मेरे मन को शांत कर सकते हैं? मैं बड़ी उम्मीद लेकर आपके पास आया हूं बाकी तो मैंने सारे उपाय कर लिए बस आप ही मेरी अंतिम आशा हो”


बौद्धभिक्षु उस राजा से कहते हैं - “बिल्कुल मैं तुम्हारे मन को शांत कर सकता हूं”


राजा बहुत खुश होता है और कहता है कि उसके लिए मुझे क्या करना होगा


बौद्धभिक्षु मुस्कुराते हैं और कहते हैं - “ कल सुबह तुम मेरे पास आना और ध्यान रहे कि अकेले ही आना”


राजा कहता है कि ठीक है मैं कल सुबह तुम्हारे पास आ जाऊंगा।


बौद्धभिक्षु कहते हैं कि एक बात और तुम अपने अशांत मन को अपने साथ लाना।


राजा चोंक जाता है और अपने मन में सोचते हैं कि यह क्या कहा बौद्धभिक्षु ने और बौद्धभिक्षु से कहता है आपने क्या कहा एक बार फिर से कहिए..!


बौद्धभिक्षु कहते हैं - “तुम कल सुबह जल्दी आना और अपने अशांत मन को साथ में लाना कहीं ऐसा ना हो कि तुम उसे अपने महल में ही छोड़ आओ”


राजा सोचता है क्या यह कोई पागल व्यक्ति है लेकिन उस राजा के पास और कोई विकल्प नहीं था इसीलिए राजा ने सोचा एक बार प्रयास कर ही लेते हैं अगले दिन राजा सुबह-सुबह अकेला बौद्धभिक्षु के पास पहुंचा और बौद्धभिक्षु से कहता है कि मैं आ गया।


बौद्धभिक्षु उस राजा से कहते हैं - “तुम तो आ गए लेकिन तुम्हारा अशांत मन कहां है? लाओ उसे मुझे दे दो मैं उसे अभी शांत करके तुम्हें दे देता हूं।


राजा कहता है - “यह आप कैसी बात कर रहे हैं आप इतने पहुंचे हुए सन्यासी होकर यह भी नहीं जानते कि  मन कोई वस्तु नहीं है जिसे में उठाकर तुम्हें दे दूं मन तो मेरे भीतर है”


बौद्धभिक्षु कहते हैं - “ठीक है बैठ जाओ और आंख बंद करके अपने उस अशांत मन को अपने भीतर खोजो”


राजा आंख बंद करके उस अशांत मन को अपने भीतर खोजने का प्रयास करता है बहुत देर आंख बंद करके बैठने के बाद बौद्धभिक्षु राजा के कंधे पर हाथ रखते हैं और कहते हैं आंख खोलो राजा आंख खुलते ही और बौद्धभिक्षु उससे पूछते हैं


“क्या तुम्हें तुम्हारा अशांत मन मिला?”


राजा कहते हैं -  नहीं..!


बौद्धभिक्षु से कहते हैं - “कोई बात नहीं अब तुम कल प्रयास करना आज के लिए इतनी खोज पर्याप्त थी”


राजा अपने महल चला जाता है फिर अगले दिन राजा फिर बौद्धभिक्षु के पास आता है और वैसा ही करता है जैसा कल बौद्धभिक्षु ने बताया था। राजा आंख बंद करके बैठ जाता है और अपने  अशांत मन को अपने भीतर खोजने लगता है राजा बहुत देर तक बैठा रहता है बौद्धभिक्षु फिर से राजा के कंधे पर हाथ रखते हैं और कहते हैं क्या तुम्हें तुम्हारा अशांत मन मिला राजा बहुत ही धीमी आवाज में कहता है नहीं।


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बौद्धभिक्षु राजा से कहते हैं कोई बात नहीं आज के लिए इतना ही पर्याप्त है अब तुम कल आना।


वह राजा अगले दिन फिर बौद्धभिक्षु के पास आया और फिर वैसा ही करता है जैसे अभी पिछले 2 दिन से कर रहा था राजा आंख बंद करके बैठ जाता है और अपने भीतर अपने अशांत मन को खोजने लगता है इस बार बौद्धभिक्षु राजा के कंधे पर हाथ नहीं रखता उसकी आंखें नहीं खुलती वह राजा बस आपनी आंखें बंद करके बैठा रहता है बहुत समय बीत जाता है। बौद्धभिक्षु राजा के पास ही बैठे रहते हैं पूरा दिन बीत जाता है पूरी रात बीत जाती लेकिन राजा अपने उस अशांत मन को ढूंढ रहा होता है।


अगले दिन राजा की आंखें खुलती है और जैसे ही राजा की आंखें खुलती है वह अपने सिर को बौद्धभिक्षु के चरणों में रख देता है ओर कहता है कि मुझे मेरा अशांत मन तो नहीं मिला है लेकिन वह शांति जरूर मिल गई जिसकी तलाश में मैं अभी तक भटक रहा था।


कहानी से मिली सीख


दोस्तों उस राजा की तरह हम भी अपने मन की शांति को कहीं बाहर खोज रहे होते हैं जबकि वह शांति कहीं बाहर नहीं अपने भीतर ही होती है जरूरत है तो उसे अपने अंदर खोजने की ओर उसका समाधान करने की।

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