एक बूढ़ा आदमी और उसका पोता | Old people moral story in hindi

एक बूढ़ा आदमी और उसका पोता - हिंदी नैतिक कहानी | Old people moral story in hindi


एक बूढ़ा आदमी और उसका पोता - हिंदी नैतिक कहानी | Old people moral story in hindi


बहुत समय पहले की बात है एक गांव में एक अकेले परवरिश करने वाला एक पिता रहता था जिसका नाम मनोहर था। वह हमेशा एक अच्छे मूड में रहता था किसी भी परिस्थिति में , मनोहर अपने बेटे आदित्य से बहुत प्यार करता था। क्योंकि पूरी दुनिया में वह उसका इकलौता साथ ही था वह अपने बेटे की बहुत अच्छी देखभाल करता है और कभी भी उसको मां की गैर हाजिरी नहीं महसूस होने देता, वह अपने बेटे को समय से नहलाता उसे अच्छा खाना देता और अच्छा पहनाता था।


एक दिन जब आदित्य प्याले से सूप पी रहा था तब उसने उसे गिरा दिया और उसके टुकड़े टुकड़े हो गए और वह रोने लगा लेकिन उसके पिता जल्दी आ गये उसे सांत्वना देने के लिए उन्होंने कहा;


“अरे बेटा कोई बात नहीं हम तुम्हारे लिए नया खरीद लेंगे फिक्र मत करो बेटा”


“धन्यवाद पिताजी.!!”


समय बीतता गया और अब आदित्य बड़ा हो चुका था और नौजवान भी हो चुका था गांव में उसे हर कोई आदित्य हैंडसम के नाम से बुलाता था।


एक दिन जब वह बाजार से जा रहा था तब उसे एक लड़की ने कहा


“आदित्य हैंडसम क्या तुम जाकर नारियल पानी लाना चाहोगे”


“हां जरूर पर किसी और दिन मुझे अभी इस वक्त अपने पिता की सेवा में जाना है”


“वह बूढ़ा मनोहर... उसे कहना कि हमने उसे हेलो कहा”


“मैं जरूर कहूंगा”


मनोहर बूढ़ा मनोहर कहा जाने लगा था क्योंकि अब वह बूढ़ा और कमजोर हो चुका था लेकिन आदित्य उसका हमेशा ध्यान रखता वह यह ध्यान रखता था कि जब भी उन्हें उसकी जरूरत पड़े वह उनके साथ हो।


दिन गुजरते गए और जल्द ही आदित्य को एक लड़की से प्यार हो गया जिसका नाम था स्वाति। वह एक दूसरे से इतना प्रेम करने लगे थे कि उन्होंने शादी करने का फैसला किया। जल्द ही मनोहर के आशीर्वाद से जल्दी ही आदित्य और स्वाति का विवाह हो गया मनोहर अपनी बेटी के साथ बहुत खुश था। लेकिन वह इस बात से बेखबर था कि जल्द ही उसके साथ अब क्या होने वाला है।


जैसे जैसे कुछ दिन बीत गए स्वाति ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। वह आदित्य को अपने पिता से दूर करने लगी और जल्दी ही आदित्य एक बदला हुआ इंसान था। वह पहले जो आदर और सम्मान उसका अपने पिता के प्रति था वह धीरे-धीरे खत्म होता गया ओर वह अपनी पत्नी के ज्यादा करीब होने लगा और स्वाति आदित्य को नियंत्रित करने लगी ओर वह चाहती थी की आदित्य उसकी हर मुराद पूरी करे।


“आदित्य तुम कहां जा रहे हो?”- स्वाति ने कहा


“मैं पिताजी को देखने जा रहा हूं, मैं यह देखने जा रहा हूं कि उन्होंने खाना खाया या नहीं”


“तुम बस अपने पिता के बारे में ही सोचते रहो और मेरा क्या? आदित्य मेरे बारे में भी सोचो क्या तुम्हारी मेरे प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है?”


“यह लो..! मैं अब तुम्हारे पास बैठ गया अब खुश हो”


इस तरह स्वाति आदित्य को अपने ही पिता से दूर करने में सफल हो गई वह अपने पति को पूरी तरह अपने लिए ही रखना चाहती थी ओर अव वह मनोहर से बदतमीजी करने लगी।


“तुम्हारे पिता हर समय सोते रहते हैं मुझे उनकी खर्राटों की आवाज सहन नहीं होती”


“ पिताजी आप थोड़ा इस बात का ध्यान रखिए आप ध्यान रखेंगे क्या”- आदित्य ने मनोहर से कहा


अब जल्द ही मनोहर और ज्यादा अकेलापन महसूस करने लगा और अपने पुत्र से जुदा होने लगा उसके पास बात करने के लिए और अपनी भावनाओं को बताने के लिए कोई नहीं था 1 साल गुजर गया और स्वाति ने एक बेटे को जन्म दिया है जिसका नाम उन्होंने रखा ऋषभ।


ऋषभ मनोहर के लिए नए जीवन का पैगाम बनकर आया वह ऋषभ के साथ खेलता, और उसकी अच्छे से देखभाल करता था ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार व आदित्य की करता था। स्वाति को उसके दादा और ऋषभ के बीच यह निकटता पसंद नहीं थी।


“आदित्य तुम मुझसे बिल्कुल प्यार नहीं करते तुम्हें तो बस तुम्हारे पिता से ही प्यार” - स्वाति ने कहा


“ऐसा कुछ नहीं है मेरी प्रिय”


“तो फिर तुम अपने पिता को किसी वृद्ध आश्रम में क्यों नहीं भेज देते?”


“हम ऐसा नहीं कर सकते यह उन्ही का घर है और हमें किसी ऐसे की जरूरत है जो हमारे बच्चे की देखभाल कर सकें”


स्वाति ने सिर हिलाया क्योंकि उसने जान लिया कि आदित्य सही कह रहा है क्योंकि वह अकेले ही ऋषभ की देखभाल और घर का सारा काम नहीं कर सकती थी।


“तुमने सही कहा पर यह हमेशा के लिए नहीं चलेगा मैं तो चाहती हूं वह जल्द से जल्द इस घर से चले जाएं”


ऋषभ को पैदा हुए 8 साल हो चुके थे मनोहर अब और भी बूढ़ा हो चुका था उसकी आंखें धुंधली हो चुकी थी उसके कान सुन नहीं पाते और उसके हाथ और घुटने भी कांपने लगे थे। उसका पोता ही एकमात्र कारण था जिसने उसे जिंदा रखा जल्द ही मनोहर की हालत बहुत खराब हो गई उसके खाना खाते समय इतने हाथ कांपते कि वह ठीक से चम्मच भी नहीं पकड़ पाता एक दिन जब वह खाने की टेबल पर बैठा था तो वह चम्मच से खा रहा था उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि शोरबा उसके हाथ से टेबल पर गिर गया इससे स्वाति को बहुत गुस्सा आ गया;


“हे भगवान यह बहुत ही महंगा टेबल है जो मैंने बाजार से खरीदा था अब इसे कौन धोएगा” - स्वाति ने कहा


स्वाति बहुत ज्यादा गुस्सा हो गई और फिर आदित्य ने यह फैसला किया कि अगले दिन से मनोहर खाने की टेबल पर नहीं बैठेगा और अब मनोहर को खाना खाने के लिए घर के किसी कोने में बैठना पड़ता उसे अब मिट्टी के बर्तन में खाना दिया जाता। एक दिन जब मनोहर खाना खा रहा तब उससे वह मिट्टी का बर्तन टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गया स्वाति दौड़कर वहां आई और कहने लगी;


“ओह नहीं यह महंगा मिट्टी का प्याला था जो मेरे परिवार वालों ने मुझे गिफ्ट में दिया था तुम तो मेरे पति की कमाई पर जी रहे हो तुम इतने महंगे प्याले पर परोसने के लायक ही नहीं हो।”


मनोहर देखता रहा उसने कुछ नहीं कहा आंसू भरी आंखों से वह टुकड़ों को देखने लगा इसी बीच नन्हा ऋषभ इन सभी बातों को खोने में खड़ा बड़ी ध्यान से देखता रहा। मनोहर को बहुत ठेस पहुंची अपने बेटे और बहू के व्यवहार से असहाय वह अक्सर सोचता अतीत के उन दिनों के बारे में जब आदित्य एक बच्चा था और उसके हाथ से प्याला टूट गया था।


आदित्य और स्वाति उसके लिए एक लकड़ी का कटोरा ले आए थे उसी में अब मनोहर को खाना पड़ता था पर ऋषभ एक ऐसी चीज था जो उनके चेहरे पर मुस्कान ला देता था ऋषभ अक्सर आता और मनोहर के पास बैठ जाता जब तक कि वह अपना भोजन खत्म ना कर ले कई हफ्ते गुजर गए और मनोहर की वही आम उदास है जिंदगी चलती रही।


एक दिन जब स्वाति और आदित्य साथ में बैठे थे तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा ऋषभ  लकड़ी के टुकड़े इकट्ठे कर रहा है।


“देखो ना कितनी मासूमियत से हमारा बेटा खेलता है” - स्वाति ने कहा


“तुम क्या कर रहे हो ऋषभ क्या तुम हमारे लिए घर बना रहे हो इन लकड़ियों का”


“नहीं मैं आपके लिए लकड़ी का प्याला बना रहा हूं” - ऋषभ ने कहा


“हमारे लिए लकड़ी का प्याला..? पर बेटा हमें लकड़ी के प्याले की जरूरत नहीं है”


“अभी नहीं पर तुम दादा जितने बूढ़े हो जाओगे तब मैं नहीं चाहूंगा कि तुम मिट्टी के बर्तन तोड़ो इसलिए मैं अभी से बना रहा हूं”


इस बात ने आदित्य और स्वाति के सीधे दिल पर वार किया और उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया।


 "स्वाति हमने कितना बड़ा पाप किया है” - आदित्य ने स्वाति से कहा


“हां मेरे प्रिय हमने पिताजी के साथ बहुत ही बेरहमी भरा व्यवहार किया है हमारे नन्हे बच्चे ने हमारी आंखें खोल दी चलो पश्चाताप करें और उनसे बेहतर व्यवहार करें”


और इस तरह से अगले दिन से उन्होंने मनोहर की बहुत अच्छे से देखभाल की उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि वह हमेशा उनके साथ खाना खाए और उनको हमेशा खुश मिजाज और जिंदादिल रखें आदित्य ने कसम खाई हमेशा अपने पिता की देखभाल करने के लिए यह उसका बेटा ही था जिसने उसे एहसास कराया कि वह अपने पिता से अच्छा बर्ताव नही कर रहे हैं।

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