अपने आत्मबल को अभ्यास से बढ़ाएं | Increase your confidence with practice in hindi

अपने आत्मबल को अभ्यास से बढ़ाएं | Increase your confidence with practice in hindi


अपने आत्मबल को अभ्यास से बढ़ाएं | Increase your confidence with practice


जब संकट आता है तो अक्सर हम धैर्य खोने लगते हैं हार मानने लग जाते हैं, लेकिन यह न भूले कि इंसान बड़ी से बड़ी आपदा के दौर से निकलता रहा है ऐसा संभव हुआ है उसके आत्माबल यानी स्वयं के विश्वास से। यह नहीं भूले कि जीवन कभी सहज नहीं होता उतार-चढ़ाव आते ही हैं पर अगर आत्मबल की पतवार हमारे हाथ में है तो हम बड़े से बड़े मुश्किल के भंवर से भी आसानी से उभर सकते हैं। आत्म बल को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि अपनी दिनचर्या को अनुकूल बनाए इसमें कुछ अभ्यास को शामिल करें।


यह आत्मबल हर व्यक्ति की सबसे बड़ी निधि होता है सबसे अच्छी बात यह है कि हम आत्मबल का विकास कर सकते हैं इसे मजबूत कर सकते हैं। इसके लिए कुछ उपायों को आजमाये तो आप स्वयं पाएंगे कि आपके अंदर एक आकूत ऊर्जा का संचार हो रहा है आप पाएंगे कि आपके आत्म बल की चमक धीरे-धीरे बाहर फैल रही है। आप उस छात्र के चेहरे की कल्पना करें जो परीक्षा से पहले आश्वस्त होता है। उसके हाव-भाव में आत्मविश्वास साफ नजर आता है वह उन छात्रों से अलग दिखता है जिन्होंने पूरे वर्ष बेपरवाही की और परीक्षा सामने देख तनाव में आ गए। नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्र क्यों आस्वस्त रहता है इसका एक ही कारण है कि उसने पूरी तैयारी की हुई है यह तैयारी है उसे आत्मबल से भर देती है।


ठहराव है पहला पड़ाव – इसके लिए आपको अपनी ऊर्जा को एकाग्र करना है आवेग भरे मन को पूरी शक्ति से रोकना है ठहर जाना है। ठहरना, यानी चेतना को जागरूक अवस्था में महसूस करना। जब आप अपनी जागरूक अवस्था में आ जाते हैं तो निश्चित रूप से आपके जीवन के हर पहलू में विकास निश्चित है। चाहे वह भौतिक सुख हो या भावनात्मक। ठहराव का अभ्यास करते रहे तो हम केवल वर्तमान पर टिककर सोच पाते हैं, सचेत रहते हैं, अपने जीवन में होने वाली हर परिस्थिति में वास्तविक रूप से जुड़े रहते हैं। आप जीवन के दोनों पक्षों को यानि खुशी और दुख को समझने का प्रयास करते हैं साथ ही आपको अपनी जिम्मेदारी का भी आभास होता है हमारे पास जो कुछ है उसमें संतोष महसूस होता है हम अपने रिश्तो के प्रति कृतज्ञ होने लगते हैं।


अपने आप को जाने आत्ममंथन करें – आपको खुद से बात करनी है अपने भीतर देखने की क्षमता विकसित हो ताकि आप जान सके कि आप की खूबियां और कमजोरियां क्या है? आप किन शक्तियों के कारण जीवन में आगे बढ़ते हैं और कौन सी वह चीजें हैं जो आपके कदम पीछे खींचते हैं। आत्म बल के विकास में यह एक निर्णायक चयन है जब हम स्वयं से बातचीत करना शुरू कर देते हैं तब हम अपनी इच्छा को वास्तविक रूप देते हैं और उसी के अनुरूप अपना लक्ष्य भी तैयार करते हैं। हां इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि हम खुद से कैसे बात करते हैं इस दौरान सजग रहे। खुद के प्रति दया और क्षमा का भाव रखें अपनी कटु आलोचना से बचें खुद को प्रोत्साहित करते रहें आत्म मंथन के दौरान यदि आपने सावधानी नहीं बरती तो आप नकारात्मक शक्तियों को निमंत्रण देंगे। आत्म मंथन करते समय हमेशा वज्रासन में बैठे हैं।


बीज ध्यान का अभ्यास – ध्यान से चेतना जागृत होती इससे आप विवेकपूर्ण निर्णय ले पाते हैं यदि आप पहली बार ध्यान कर रहे हैं तो बीज ध्यान करें इसे आरंभ ध्यान भी कहा जाता है। बीज का अर्थ होता है आरंभ,  इस ध्यान के अभ्यास के लिए एक सफेद और एक काले होल यानी छिद्र की कल्पना करें, कल्पना करें कि आप सभी अनचाहे दर्द और नकारात्मकता के एहसास को एक काले छिद्र में डाल रहे हैं। आप सकारात्मकता प्रसन्नता और शांति को एक सफेद छिद्र से निकालकर  उन्हें अपनी सांसों में धारण कर रहे हैं। बीज ध्यान का अभ्यास कम से कम 11 बार करें। इस दौरान खुद से कहें कि मेरे अंदर ऊर्जा का सतत प्रवाह हो रहा है बाहर बुरा घट रहा है लेकिन मैं ठीक हूं। मैं चाहूं तो इस स्थिति बदल सकती है। ऐसा खुद से लगातार कहें आप दो से 3 हफ्ते के अभ्यास से बदलाव की अनुभूति कर पाएंगे। बीज ध्यान के लिए बस 5 मिनट भी निकाल ले तो यह लाभकारी है। इस ध्यान से बुद्धि बल का विकास होगा तो आप कीचड़ में कीचड़ पर नहीं बल्कि कमल पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।


भीतर पाएं समुद्र सी गहरी शांति – जब आप सजग होते हैं आत्म मंथन करते हैं और बीज ध्यान का अभ्यास करते हैं तब आपको अपने व्यवहार की समझ आती है अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना आ जाता है। शांत हमारा स्वभाव है जैसे समुद्र अपनी गहराइयों में शांत है, वही उसका स्वभाव है लहरें जो ऊपर शोर मचा रही हैं वह समुद्र की बस परिस्थितियां हैं स्व यानी खुद को जान गए तो धीरे-धीरे समुद्र की शांति अपने भीतर ला सकते हैं।



विचारों का पैटर्न, अभ्यास से बदला जा सकता है। – हमारा दिमाग हमेशा उन्हीं चीजों पर ध्यान देता है जिसके बारे में हम ज्यादा सोचते हैं दिमाग में परिस्थिति के अनुकूल बदलने की अद्भुत क्षमता होती है जिसे न्यूरोप्लास्टी कहा जाता है। दरअसल हमारा दिमाग एक विचार के लिए राह तैयार करते रहता है इसे न्यूरोलॉजी पाथवेज कहा जाता है। जब हम बार-बार किसी एक बात को सोचते हैं तो उससे संबंधित तंत्रिका कोशिका मजबूत होती चली जाती है और वह विचार पक्का होने लगता है। वहीं जब हम किसी विचार या कार्य को बीच में छोड़ देते हैं तो उस विचार या कार्य से जुड़ी तंत्रिका कोशिका अपने आप लुप्त हो जाती है। इसलिए विचार भी बदल जाते हैं पहले यह विश्वास किया जाता था कि विचार से जुड़ी तंत्रिका निर्माण की प्रक्रिया बहुत छोटी उम्र में पूरी हो जाती है। यानी व्यक्ति बचपन में जो विचार बना लेता है वह बड़ी उम्र तक नहीं बदल सकता पर अब विज्ञान भी मानता है  कि व्यस्क भी चाहे तो नई तंत्रिकाओं का निर्माण कर एक नया विचार तैयार कर सकते हैं।


जब आप स्व से अनजान होते हैं अर्थात यूं कहें कि आपको अपनी मजबूती और कमजोरियों का पता नहीं होता तो आपको यह भी नहीं पता चलता कि कौन सी राह सही है और कौन गलत। असमंजस से भरा मन बाहर के परिवेश को ही सच और अस्थाई मान लेता है यह सही है कि इस समय बाहरी परिवेश हमें भयावहता का एहसास करा रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि आप निश्चित रूप से उससे निकल सकते हैं। बस अपने अंदर ठहराव लाएं आत्ममंथन करते रहें। ध्यान का अभ्यास करते रहें।





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