कबीरदास जी के दोहे | Kabirdas dohe meaning in hindi

कबीरदास जी के दोहे कक्षा 9 के साखियाँ एवं सबद | Kabirdas dohe with meaning in hindi


कबीरदास जी के दोहे कक्षा 9 के साखियाँ एवं सबद | Kabirdas dohe with meaning in hindi



• मानसरोवर सुभर जल, हँसा केली कराहिं ।

मुकताफल मुकता चुगे, अब उड़ी अनंत ना जाहिं ।।


भावार्थ:- मानसरोवर में जो आत्मा होती है वह पूरी तरह से मग्न है उसे भक्ति के पावन मोती प्राप्त हो रहे हैं और वह इस स्थान को छोड़कर कहीं और जाने का विचार नहीं कर सकता।


• प्रेमी ढूंढत मैं फ़िरों, प्रेमी मिले ना कोई ।

प्रेमी को प्रेमी मिले, सब विष अमृत होई ।।


भावार्थ:-  इस पंक्ति में कबीरदास जी कहते हैं कि मैं किसी सच्चे प्रेमी को ढूंढने के लिए निकला, लेकिन बहुत प्रयत्न करने पर भी वह मुझे नहीं मिला और जब मुझे वह सच्चा प्रेमी मिला, तो मेरे जो भी सभी पाप थे वह पुण्य में बदल गए, मेरी सारी बुरी भावनाएं दूर हो गई अर्थात जब हमें कोई सच्चा सज्जन व्यक्ति मिलता है तो हमारे सभी पाप पुण्य में बदल जाते हैं।


• हस्ती चढ़िए ज्ञान को, सहज दुचीला डारी ।

स्वान रूप संसार है, भूखन दे झक मारी ।।


भावार्थ:- ज्ञान प्राप्ति में जो लीन साधक होते हैं उन को संबोधित करते हुए यहां कबीरदास जी कहते हैं सत्य एवं स्वाभाविक आसन को ज्ञान रूपी हाथी पर डाल कर चलते रहो क्योंकि यह अज्ञानी संसार उस कुत्ते के समान है जो हाथी को देखकर भौंकता है और अपना समय खराब करता है, जबकि हाथी किसी की परवाह किए बिना अपने स्वाभाविक चाल में चलता रहता है उसी प्रकार साधक को भी संसार की चिंता किए बिना अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए।


• पखापखी के करनै सब जंग रहा भुलान ।

निरपख होई के हरि भजे, सोई संत सुजान ।।


भावार्थ:- कबीरदास जी कहते हैं भक्ति के मार्ग में पक्ष-विपक्ष के कारण संसार भक्ति का असली मार्ग भूल गया है अगर हमें सच्ची भक्ति प्राप्त करनी है तो पक्ष विपक्ष का यह जो दलदल है उससे हमें मुक्त होना होगा। अर्थात जो भक्त निष्पक्ष होकर भगवान का भजन करता है सच्चे अर्थों में वही संत कहलाता है क्योंकि भक्ति के मार्ग में कहीं भी पक्ष विपक्ष का व्याख्यान नहीं है।


• हिंदू मुआ राम कही, मुसलमान कहि खुदाई ।

कहे कबीर सो जीवता, जी दुंहुँ के निकटि ना जाई ।।


भावार्थ:- कबीरदास जी कहते हैं हिंदू राम का नाम लेते हुए मर गए, मुसलमान खुदा का नाम लेते लेते मर गए और सभी अपने धार्मिक अंधविश्वासों के कारण अपने ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सके। जो भी साधक इस बनावटी मार्ग से दूर रहता है वही जीवन के बाद भी जीवित रहता है ऐसे ही साधक सार्वभौमिक सत्य को महत्व देते हैं।


• काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम ।

मोट चून मैदा भया, बैठी कबीरा जीम ।।


भावार्थ:- कबीरदास जी कहते हैं जब मनुष्य धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठ जाता है तब मुसलमानों की तीर्थ स्थान काबा, और हिंदुओं का तीर्थ स्थान काशी के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है जिस मोटे चुन को में अखाद्य समझ रहा था वही मेरे लिए मैदा हो गई उसे ही बैठ कर अब मैं आराम से खा रहा हूं अर्थात जिन चीजों को मैं कठिन समझता था वह मेरे लिए सरल हो गई हैं।


• ऊंचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होई ।

सुरबन कलस सूरा भरा, साधू निंदा होई ।।


भावार्थ:- कोई मनुष्य उच्च कुल या जाति में जन्म लेता है लेकिन वह अपने कर्मों से ऊंचा नहीं होता, तो वह अच्छा मनुष्य नहीं कहलाता क्योंकि ऊंचे कुल में भी जन्म लेकर उसके कर्म अच्छे नहीं हैं, अर्थात शराब भले ही सोने के कलश में क्यों न भारी हो तब भी वह साधुओं के लिए निंदा का कारण ही है। उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्मों से महान बनता है ना कि उच्च कुल में जन्म लेने से।


कबीरदास से संबंधित कुछ सवाल व उनके जवाब


• कबीर ने पुस्तक की ज्ञान की अपेक्षा किस ज्ञान को प्रमुखता दी हैं?


➡ कबीर ने पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष ज्ञान को उपयोगी माना है।


• कबीर के अनुसार किस प्रकार एक चींटी भी हाथी के समान होती है?


➡ कबीरदासजी एक उदाहरण से यह समझाते हैं कि जिस प्रकार चींटी छोटे होने पर भी शक्कर लेकर चलती हैं लेकिन एक हाथी जो कि उससे कई गुना बड़ा है उसके सिर में अक्सर धूल ही होती हैं। शक्ति, बड़प्पन, कायबल आदि से नहीं बल्की व्यवहार के कारण ही एक व्यक्ति में उन्नति और अवनति होती हैं।


• कबीरदास के रहस्यवाद के कितने प्रकार हैं?


➡ सामान्यतः रहस्यवाद दो प्रकार के होते हैं,1.) साधनात्मक रहस्यवाद 2.) भावनात्मक रहस्यवाद, लेकिन कबीर के काव्य में चार प्रकार के रहस्यवाद के दर्शन होते हैं।


• कबीर के अनुसार हमें किस तरह वार्तालाप करना चाहिए?


➡ कबीर जी कहते हैं कि हमारे बोलने का तरीका या भाषा बेहद अचूक हथियार और संपत्‍ति है। इसलिए बोलने से पहले सौ बार मन में विचार कर लेना चाहिए। बिना सोचे बोलने वाला अक्‍सर बाद में पछताता तो है ही लोग उसे मूर्ख भी समझते हैं। 


• कबीर साहिब की पक्की देह कौन सी थी और पक्की देह को कैसे पहचाने कौन से पक्के तत्व थे?


➡ पहले जीव में सत्य स्वरूपी  देह थी ,पिंड और ब्रह्मांड ये दोनों सत्यस्वरूप और पक्के थे, पाँच पक्के तत्व और तीन गुण थे । पक्के पाँच तत्व;  धैर्य्य, दया, शील, विचार और सत्य, कहलाते हैं। ओर तीन गुण; विवेक , वैराग्य, गुरुभक्ति साधुभाव थे। इन्ही पाँच तत्वोके और तीन गुणों की हंसा की  देह थी । इस जीव का  प्रकाश और स्वभाव अद्वितीय था ।


हंस देह के पक्के पांच तत्व


धैर्य , दया, शील, विचार, सत्य ये पांच पक्के तत्वों की पक्की देह थी। इन्ही से हंस देह बनती हैं। ओर इसका त्रिगुण सत्य, और विचार का गुण विवेक शील, और दया का गुण गुरु भक्ति, साधु भाव और धैर्य्य का गुण वैराग्य था

इन्ही पक्के पांच तत्व और तीन गुणों में जीव का वास था।


• कबीर के अनुसार किन लोगों को आत्मज्ञान नहीं होता?


➡ कबीर दास जी के अनुसार उन लोगों को आत्मज्ञान या आत्मबोध नहीं हो सकता जो सत्य का विरोध करते हैं तथा झूठ का विश्वास करते हैं ऐसे लोग आत्मज्ञान को छोड़कर मूर्ति पूजा, पीपल पूजा जैसे धार्मिक आडंबर करते हैं।



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