महात्मा बुद्ध और सांप की कहानी | Gautam buddha inspirational story in hindi

महात्मा बुद्ध और सांप की कहानी | Gautam buddha inspirational story in hindi


महात्मा बुद्ध और सांप की कहानी | Gautam buddha inspirational story in hindi


महात्मा बुद्ध और सांप की कहानी | Gautam buddha inspirational story in hindi


एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठकर उन्हें कुछ समझा रहे थे इतने में ही वहां अजातशत्रु और पहुंचते हैं और बुद्ध से कहते हैं कि;


“हे बुद्ध जब से में तुम्हारा अनुयायी बना हूं तब से सभी लोग मेरे सीधेपन का बहुत फायदा उठाते हैं। आपका अनुयाई बनने से पहले लोग मुझसे बहुत डरते थे। क्योंकि तब मैं बहुत क्रूर था और किसी को भी मृत्युदंड देने में क्षणभर का भी समय नहीं लगाता था। आपका अनुयाई बनने के बाद अब मेरा मन इन कामों को करने को तैयार नहीं होता है और मैं सभी लोगों को प्रेम देना चाहता हूं परंतु कुछ लोग इस बात का गलत फायदा उठा रहे हैं और इससे मेरी प्रजा को बहुत खतरा है.. मेरे शासन में बहुत दिक्कतें आ रही हैं अब बताएं मैं क्या करूं”?


तब बुद्ध उसे एक कहानी सुनाते हैं;


एक बार एक भिक्षु एक गांव से गुजर रहा था। उस गांव में एक बहुत बड़ा पीपल का वृक्ष था। चलते-चलते भिक्षु बहुत थक गया था। उसने सोचा कि उस वृक्ष के नीचे थोड़ा आराम कर लिया जाए वह वहां पहुंचा ही था कि कुछ लोग उसे रोक देते हैं और भिक्षु से कहते हैं;


“कि वहां एक बहुत जहरीला सांप रहता है उसने बहुत से लोगों को डस लिया है वह इतना खतरनाक है कि जो भी उसके सामने आता है वह उसे जिंदा नहीं छोड़ता”


भिक्षु मुस्कुराता है और कहता है;


“एक दिन तो सभी को मरना है अगर मुझे आज ही मरना होगा तो इसमें कौन सी बड़ी बात है आप मेरी जरा भी चिंता ना करें और मुझे आज्ञा दें”


भिक्षु वहां से चल देता है और पेड़ के नीचे अपना आसन बिछाकर बैठ जाता है थोड़ी ही देर बाद उसके सामने सांप आता है और उससे कहता है;


“क्या तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता? क्या तुम्हें पता नहीं यह मेरा इलाका है? और यहां पर आने की किसी की भी हिम्मत नहीं होती”


तब भिक्षु उसे बहुत ही प्रेम के साथ कहता है;


“इसमें डर वाली कौन सी बात है तुम जो भी करते हो वह इसलिए करते हो क्योंकि तुम्हें डर है कि कोई तुम्हें मार ना दे इसीलिए तुम दूसरे को डरते हो। मुझे किसी बात का डर नहीं ना ही मुझे मृत्यु का डर है ओर ना ही जीवन की लालसा है। कोई मुझे नुकसान पहुंचा ही नहीं सकता तो फिर मैं क्यों डरूं?" 

सांप को यह सुनकर बहुत गहरा आघात पहुंचता है। उसने आज तक ऐसे व्यक्ति देखे जो उस से डरकर भागते थे उसने आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं देखा था जो उससे नहीं डरे भिक्षु की इतनी बातें सुन सांप उनके के चरणों में लेट जाता है और उनसे कहता है;


“आज तक मैंने जो भी किया अपनी जान बचाने के लिए किया क्योंकि अगर मैं इस तरह का रूप धारण नहीं करता तो लोग मुझे जिंदा नहीं छोड़ते”


तब भिक्षु उससे कहता है;


“तुम एकदम सही कह रहे हो लेकिन अगर तुम इस मोह से मुक्त होना चाहते हो तो एकदम शांत हो जाओ प्रेम से भर जाओ और यह जानो कि एक दिन जीवन समाप्त हो ही जाएगा उसके लिए बुरे कर्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है”


इतना कहकर वह भिक्षु वहां से चले जाता है और सांप उस भिक्षु की सारी बातें अपने दिमाग में बैठा लेता है और वह यह तय करता है कि आज से वह कोई भी गलत काम नहीं करेगा सांप सभी बुरे कर्मों को छोड़ देता है लेकिन इसका उस पर उल्टा असर पड़ता है।


जो लोग उसे पहले देखकर भागते थे अब उसके सीधेपन का गलत उपयोग करने लगे अब सब लोग उसे छेड़ते, उसे चोट पहुंचाते अब सांप बहुत दुखी रहने लगा और बहुत ज्यादा चोट से ग्रस्त रहने लगा। अब उसके शरीर पर बहुत से चोट के निशान बन गए क्योंकि अब वह लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाता था और सभी लोगों के साथ प्रेम से रहने की कोशिश करता था लेकिन लोगों में उसके प्रति जो भय था वह ही उसे सुरक्षित रखता था।


कुछ दिनों बाद वह भिक्षु फिर से उसी पेड़ के नीचे आता है और वहां अपना आसन बिछाकर बैठ जा है और उस सांप को देख कर बड़ा आश्चर्यचकित होता है कि पहले सर्प की क्या स्थिति थी लेकिन अब सर्प की क्या स्थिति हो गई है और वह उस सर्प के लिए बहुत चिंतित भी होता है भिक्षु को देख कर सांप कहता है।


“हे भिक्षु जब से आप ने मुझसे कहा कि मैं शांत हो जाऊं और प्रेम को अपनाउं तब से लोगों ने मुझसे बहुत गलत व्यवहार करना शुरू कर दिया जिससे मुझे जीवन जीने में बहुत कठिनाई हो रही है अब आप ही बताएं मुझे क्या करना चाहिए?”


भिक्षु से कहता है;


“हे मित्र मैंने तुमसे यह नहीं कहा था कि तुम अपने स्वभाव को ही बदल लो तुम सर्प हो और क्रूरता ही तुम्हारा स्वभाव है अगर तुम क्रूरता नहीं रखोगे तो लोग तुम्हें खत्म कर देंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे भीतर जो उद्देश्य है उसे गलत रखो तुम्हें भीतर से अपने आप को सही रखना है और बाहर से खुद को वह दिखाना है जो जरूरी है क्योंकि सर्प एक जहरीला जीव है और लोगों में उसके लिए भय होना आवश्यक है। अगर लोगों के अंदर तुम्हारे लिए भय नहीं होगा तो लोग तुम्हें हानि ही पहुंचाएंगे लेकिन तुम्हें भीतर से अपने आप को सही रखना चाहिए कि तुम्हें किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना है केवल अपना भय बनाए रखना है”


गौतम बुद्ध कहते हैं;


“तो है अजातशत्रु तुम इस कहानी से क्या समझे तो इसका मतलब यही है कि तुम अपने स्वभाव को मत बदलो तुम अपने आपको समझो, तुम अपने आप को प्रेम पूर्ण पाओगे तो अपने उद्देश्य को अच्छा पाओगे फिर तुम्हें उससे खुशी मिलेगी और जब तुम्हें खुशी मिलेगी तो तुम लोगों को खुशी दे सकोगे और यहाँ इस बात की जरा भी जरूरत नहीं है कि तुम बाहर से लोगों को क्या दिखा रहे हो जरूरत इस बात की है कि तुम भीतर से अपना उद्देश्य क्या रखते हो।


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