Rabindranath Tagore poems in Hindi on Mother | रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं

Rabinbranath Tagore Poems In Hindi on Mother | रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं


Rabinbranath Tagore Poems In Hindi on Mother | रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं


Rabindranath Tagore poems in Hindi on Mother - रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं


रवीन्द्रनाथ टैगोर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म कोलकाता के बंगाली परिवार में 7 मई सन 1861 में हुआ था। रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर था और माता का नाम शारदा देवी था। इनका विवाह 1883 में मृणालिनी देवी के साथ हुआ। कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं काफी प्रसिद्ध है। भारत का राष्ट्रीय गान जो कि “जन गण मन” है और बंगाल का राष्ट्रीय गान जो कि “आमार सोनार बांग्ला” है यह भी रवीन्द्रनाथ टैगोर की ही रचना है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं निम्नलिखित हैं।


Rabindranath Tagore poems in Hindi on Mother



जन्मकथा



” बच्चे ने पूछा माँ से , मैं कहाँ से आया माँ ? “

माँ ने कहा - तुम मेरे जीवन के हर पल के संगी साथी हो !”

जब मैं स्वयं शिशु थी, खेलती थी गुडिया के संग , तब भी,

और जब शिवजी की पूजा किया करती थी तब भी,

आंसू और मुस्कान के बीच बालक को ,

कसकर, छाती से लिपटाए हुए , माँ ने कहा - 

”जब मैंने देवता पूजे, उस वेदिका पर तुम्ही आसीन थे ,

मेरे प्रेम , इच्छा और आशाओं में भी तुम्ही तो थे !

और नानी माँ और अम्मा की भावनाओं में भी, तुम्ही थे..!!

ना जाने कितने समय से तुम छिपे रहे !

हमारी कुलदेवी की पवित्र मूर्ति में ,

हमारे पुरखो की पुरानी हवेली मेँ तुम छिपे रहे !

जब मेरा यौवन पूर्ण पुष्प सा खिल उठा था,

तुम उसकी मदहोश करनेवाली मधु गँध थे !

मेरे हर अंग प्रत्यंग में तुम बसे हुए थे

तुम्ही में हरेक देवता बिराजे हुए थे

तुम, सर्वथा नवीन व प्राचीन हो !

उगते रवि की उम्र है तुम्हारी भी,

आनंद के महासिंधु की लहर पे सवार,

ब्रह्माण्ड के चिरंतन स्वप्न से ,

तुम अवतरित होकर आए थे।

अनिमेष द्रष्टि से देखकर भी

एक अद्भुत रहस्य रहे तुम..!!

जो मेरे होकर भी समस्त के हो,

एक आलिंगन में बध्ध , सम्बन्ध ,

मेरे अपने शिशु , आए इस जग में..

इसी कारण मैं , व्यग्र हो, रो पड़ती हूँ..

जब, तुम मुझ से, दूर हो जाते हो.!!

कि कहीँ, जो समष्टि का है

उसे खो ना दूँ कहीँ !

कैसे सहेज बाँध रखूँ उसे ?

किस तिलिस्मी धागे से ।


Gitanjali Poem By Rabindranath Tagore In Hindi



विपदा से मेरी रक्षा करना - गीतांजलि



विपदा से मेरी रक्षा करना

मेरी यह प्रार्थना नहीं,

विपदा से मैं डरूँ नहीं, इतना ही करना।


दुख-ताप से व्यथित चित्त को

भले न दे सको सान्त्वना

मैं दुख पर पा सकूँ जय।


भले मेरी सहायता न जुटे

अपना बल कभी न टूटे,

जग में उठाता रहा क्षति

और पाई सिर्फ़ वंचना

तो भी मन में कभी न मानूँ क्षय।


तुम मेरी रक्षा करना

यह मेरी नहीं प्रार्थना,

पार हो सकूँ बस इतनी शक्ति चाहूँ।


मेरा भार हल्का कर

भले न दे सको सान्त्वना

बोझ वहन कर सकूँ, चाहूँ इतना ही।


सुख भरे दिनों में सिर झुकाए

तुम्हारा मुख मैं पहचान लूंगा,

दुखभरी रातों में समस्त धरा

जिस दिन करे वंचना

कभी ना करूँ, मैं तुम पर संशय।


Famous Best Rabindranath Tagore poems Gitanjali in Hindi


कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला - गीतांजलि



कहाँ है प्रकाश, कहाँ है उजाला

विरहानल से इसे जला लो।

दीपक है, पर दीप्ति नहीं है;

क्या कपाल में लिखा यही है ?

उससे तो मरना अच्छा है;

विरहानल से इसे जला लो।।

व्यथा-दूतिका गाती-प्राण !

जगें तुम्हारे हित भगवान।

सघन तिमिर में आधी रात

तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार-

करने, रखें दुःख से मान।

जगें तुम्हारे हित भगवान।’

मेघाच्छादित आसमान है;

झर-झर बादल बरस रहे हैं।

किस कारण इसे घोर निशा में

सहसा मेरे प्राण जगे हैं ?

क्यों होते विह्वल इतने हैं ?

झर-झर बादल बरस रहे हैं।

बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती,

निविड़ तिमिर नयनों में भरती।

जानें, कितनी दूर, कहाँ है-

गूँजा गीत गम्भीर राग में।

ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती,

निविड़ तिमिर नयनों में भरती।

कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?

विरहानल से इसे जला लो।

घन पुकारता, पवन बुलाता,

समय बीतने पर क्या जाना !

निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं;

प्रेम-दीप से प्राण जला लो।।


Best Rabindranath Tagore poems in Hindi


निष्फल कामना।



सूरज डूब रहा है

वन में अंधकार है, आकाश में प्रकाश.

संध्या आँखें झुकाये हुए

धीरे धीरे दिन के पीछे चल रही है.

बिछुड़ने के विषाद से श्रांत सांध्य बातास

कौन जाने बह भी रहा है की नहीं .

मैं अपने दोनों हाथों में तुम्हारे हाथ लेकर

प्यासे नयनों से तुम्हारी आँखों के भीतर झाँक रहा हूँ .


खोज रहा हूँ की तुम कहाँ हो,

कहाँ हो तुम !

जो सुधा तुममें प्रच्छन्न है

कहाँ है वह !

जिस प्रकार अँधेरे सांध्य गगन में

स्वर्ग का आलोकमय असीम रहस्य

विजन तारिकाओं में झिलमिलाता है,

उसी प्रकार आत्मा की रहस्य-शिखा झिलमिलाती है

इन नयनों के निविड़-तिमिर दल में.

इसीलिए अपलक देख रहा हूँ.

इसीलिए प्राण-मन, सबकुछ लेकर

अतल आकांक्षा के पारावार में

दुकी लगा रहा हूँ .

तुम्हारी आँखों के भीतर,

हँसी की ओट में,

वाणी के सुधा-श्रोत में

तुम्हारे मुख पर छाई हुई करुण शांति के तल में

तुम्हें कहाँ पाऊं--

इसी को लेकर है यह रोना-धोना.


किन्तु रोना-धोना व्यर्थ है.

यह रहस्य यह आनंद

तेरे लिये नहीं है ओ अभागे !

जो प्राप्त है वही अच्छा है--

तनिक सी हँसी, थोड़ी सी बात,

टुक चितवन, प्रेम का आभास.

तू समग्र मानवता को पाना चाहता है,

यह कैसा दुःसाहस है !

भला तेरे पास क्या है !

तू क्या देने पायगा.

क्या तेरे पास अनंत प्रेम है?

क्या तू दूर कर सकेगा जीवन का अनंत अभाव?

उदार आकाश भर लोक-लोकालयों की यह असीम भीड़,

यह घना प्रकाश और अंधकार ,

कोटि छाया-पथ, माया-पथ

दुर्गम उदय-अस्ताचल

क्या इन सबके बीच से रास्ता बनाकर

रात-दिन अकेला और असहाय

चिर सहचर को साथ लेकर चल सकेगा?

जो स्वयं श्रांत, कातर, दुर्बल और म्लान है

जो भूख-प्यास से व्याकुल है,

अंधा है,

और जो दिशा भूल गया है,

जो अपने दुःख के भार से पीड़ित और जर्जर है

भला वह हमेशा के लिये किसे पा लेना चाहता है !


आदमी कोई भूख मिटाने वाला खाद्य नहीं है,

कोई नहीं है तेरा या मेरा .

अत्यंत यत्नपूर्वक बहुत चुपचाप

सुख में,दुःख में,

निशीथ में ,दिवस में,

जीवन में, मरण में,

शत ऋतु आवर्तन में

शतदल-कमल

विकसित होता है !

तुम उसे सुतीक्ष्ण वासना की छुरी से

काटकर ले लेना चाहते हो?

उसका मधुर सौरभ लो

उसका सौन्दर्य-विकास निहारो,

उसका मकरंद पियो,

प्रेम करो, प्रेम से शक्ति लो--

उसकी ओर मत ताको .

मानव की आत्मा आकांक्षा का धन नहीं है .


संध्या शांत हो गई है,

कोलाहल थम गया है .

आँख के जल की वासना की आग बुझा दो.

चलो धीरे-धीरे घर लौट चलें.


Rabindranath Tagore poems in Hindi


अकेला बैठा हूँ यहाँ



अकेला बैठा हूं यहाँ

यातायात पथ के तट पर।

बिहान-वेला में गीत की नाव जो

लाये हैं खेकर प्राण के घाट पर

आलोक-छाया के दैनन्दिन नाट पर,

संध्या-वेला की छाया में

धीरे से विलीन हो जाते थे।

आज वे आये हैं मेरे

स्वप्न लोक के द्वार पर;

सुर-हीन व्यथाएँ हैं जितनी भी

ढूंढ़ती फिरतीं बीतते ही जाते हैं,

बैठा-बैठा गिन ही रहा हूं मैं

नीरव जप माला की ध्वनि

नस-नस में अन्धकार के।


Best Rabindranath Tagore poems in Hindi


यहाँ-वहाँ की बातें आज उठ रही हैं मन में,


यहाँ-वहाँ की बातें आज उठ रही हैं मन में,

वर्षा के शेष में शरत के मेघ जैसे उड़ते हैं पवन में।

कार्य बन्धन से मुक्त मन उड़ता फिरता है शून्य में;

कभी आँकता है रूपहले चित्र, कभी खींचता है सुवर्ण रेखाएँ।

विचित्र मूर्तियाँ रचता वह दिगन्त के कोने में,

रेखाएँ बदलता है बार-बार मानो मनमने में।

वाष्प का है शिल्प कार्य मानो आनन्द की अवहेलना-

कहीं भी दायित्व नहीं, इसी से उसका खेल अर्थ शून्य हैं

जागने का दायित्व है, इसी से काम किया करता है।

सोने का दायित्व नहीं, ऊलजल्त स्वप्न गढ़ा करता है।

मन की प्रकृति ही है स्वप्न की, दबी रहती वह कार्य के शासन में,

दौड़कर बैठ नहीं पाता मन स्वराज के आसन पर।

पाते ही छुटकारा वह कल्पना में कर लेता भीड़,

मानो निज स्वप्नों से रचता है उड़ाकू पक्षी का नीड़।

इसी से मिलता है प्रमाण अपने में-

स्वप्न यह पागलपन ही है विश्व का आदि उपादान।

उसे दमन में रखता है,

स्थायी कर रखता है सृष्टि की प्रणाली

कर्तव्य प्रचण्ड बलशाली।

शिल्प के नैपुण्य इस उद्दाम को शृंखखिल करना

अदृश्य को पकड़ना है।


Best famous Rabindranath Tagore poems in Hindi


नहीं मांगता



नहीं मांगता, प्रभु, विपत्ति से,

मुझे बचाओ, त्राण करो

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान, करो।

नहीं मांगता दुःख हटाओ

व्यथित ह्रदय का ताप मिटाओ

दुखों को मैं आप जीत लूँ

ऐसी शक्ति प्रदान करो

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान,करो।

कोई जब न मदद को आये

मेरी हिम्मत टूट न जाये।

जग जब धोखे पर धोखा दे

और चोट पर चोट लगाये –

अपने मन में हार न मानूं,

ऐसा, नाथ, विधान करो।

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान,करो।

नहीं माँगता हूँ, प्रभु, मेरी

जीवन नैया पार करो

पार उतर जाऊँ अपने बल

इतना, हे करतार, करो।

नहीं मांगता हाथ बटाओ

मेरे सिर का बोझ घटाओ

आप बोझ अपना संभाल लूँ

ऐसा बल-संचार करो।

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान,करो।

सुख के दिन में शीश नवाकर

तुमको आराधूँ, करूणाकर।

औ’ विपत्ति के अन्धकार में,

जगत हँसे जब मुझे रुलाकर–

तुम पर करने लगूँ न संशय,

यह विनती स्वीकार करो।

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान, करो।


Rabindranath Tagore poems in Hindi


चल तू अकेला!


तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,

चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!

तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,

जब सबके मुंह पे पाश..

ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश,

हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय!

तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर,

मनका गाना गूंज तू अकेला!

जब हर कोई वापस जाय..

ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय,

कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय.!!!





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