चाणक्य की 7 नीतियां - chanakya neeti in hindi

चाणक्य की 7 नीतियां जो आपको नही पता - chanakya neeti in hindi

चाणक्य की 7 नीतियां - chanakya neeti in hindi

चाणक्य की 7 नीतियां हिंदी में - chanakya neeti in hindi

आचार्य चाणक्य को विष्णुगुप्त और कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता था पिता का नाम चाणक था इसलिए इनका नाम चाणक्य पड़ा। यह बुद्धि के भगवान थे इनकी कूट नीतियों के चलते कई साम्राज्य स्थापित हुए। आज हमारे देश मे कई मंत्रालय हैं यह सभी बहुत महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं और इनके लिए हमारे देश में कई अलग-अलग मंत्री और भी हैं ,लेकिन चाणक्य एक ऐसे व्यक्ति थे जो इन सभी मंत्रालय की समझ रखते थे और इन्हें खुद ही देखते थे और चाणक्य खुद आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य के प्राइम मिनिस्टर बने।


नालंदा विश्वविद्यालय में चाणक्य एक प्रोफेसर और शिक्षक थे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, राजनीतिक शासन, योजना आयोग लेखा परीक्षा तंत्र, इन सभी के चाणक्य महान ज्ञाता थे इनको समुद्र शास्त्र की भी बेहतर समझ थी, एक इंसान के चेहरे को देख कर बता देना कि वह व्यक्ति सोच क्या रहा है यह होता है समुद्र शास्त्र। चाणक्य का यही ज्ञान इन को आगे साम्राज्य स्थापित करने में बहुत महत्वपूर्ण रहा।


बचपन में एक बार चाणक्य बाहर बगीचे में खेल रहे थे, तभी इनके घर में एक ज्योतिषी आया और और उनकी मां से चाणक्य की कुंडली देखकर कहा कि उनकी कुंडली में तो आगे चलकर राजयोग लिखा है यह आगे चलकर देश का बड़ा प्रधानमंत्री भी बन सकता है फिर उनकी मां सोचने लगी की अगर यह आगे चलकर प्रधानमंत्री बन गया तो यह तो मुझे भूल जाएगा फिर उनकी मां ने कहा क्या यह बात सच है? तब ज्योतिषी बोले अगर इस बात की पुष्टि करना है तो चाणक्य के आगे के दांत देखना सामने वाले दांत में उसके नागराज का चिन्ह होगा। ओर जब चाणक्य की मां ने इस बात की पुष्टि की तो सच में सामने वाले दांत में वह नागराज का चिन्ह था और उनकी मां रोने लगी ओर बोला कि तू आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बन जाएगा और फिर मुझे भूल जाएगा, यह सुनते ही चाणक्य ने पत्थर उठाया और वह सामने वाला दांत तोड़ लिया और कहा मां तेरे प्यार के आगे में ऐसे हजारों राजपाट छोड़ दूंगा, इससे पता चलता है कि चाणक्य को कभी सत्ता का लोभ नहीं था।


आगे चलकर चाणक्य तक्षशिला के प्रधानाचार्य बने उन दिनों सिकंदर पूरी दुनिया को जीतते हुए भारत की तरफ बढ़ रहा था, सोने की चिड़िया भारत को लूटने के लिए वह आक्रमण पर आक्रमण कर रहा था, लेकिन उस समय चाणक्य के मन में केवल एक ही सपना था की क्यों ना अखंड भारत का निर्माण किया जाए और उसके लिए एक शक्तिशाली राजा को खड़ा किया जाए। फिर उन्होंने अलग-अलग राजा से मिलना शुरू किया उस समय मगध जो कि सबसे बड़ा साम्राज्य था नंदा वंश का, आज के समय का उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश उस समय मगध कहलाया जाता था और धनानन्द नंद वंश का सबसे बड़ा राजा था। चाणक्य उनके पास गए और बोले क्यों ना सिकंदर के खिलाफ हम तैयारी करें लेकिन धनानंद एक ऐसा राजा था जो प्रजा से कर वसूलता था ओर उन पैसों उसको जुआ सट्टे में, स्त्री गमन में, और भोग विलास में खर्च कर देता था धनानंद को चाणक्य ने समझाया और आप समाज से जो पैसा लेते हैं तो उसे समाज के भले में ही खर्च करें तब धनानंद को गुस्सा आया और बोला- रे पंडित तुम अपनी पंडिताई करो मुझे राजपाट मत सिखाओ जब चाणक्य ने उसे और समझाने की कोशिश की तो उसने उन्हें धक्का मार कर नीचे गिरा दिया और जब चाणक्य नीचे गिरे तो उनके बालों की शिखा(चोटी) खुल गई ,धनानंद ने बोला तेरी यही सिखा काट दूंगा इस बात का चाणक्य को बहुत बुरा लगा और उन्हें गुस्सा आ गया, फिर वह बोले मैं यह शिखा तब तक नहीं काटूंगा जब तक तेरे साम्राज्य को खत्म ना कर दूं और इस अखंड भारत का एक अच्छा योग्य राजा ना लेकर आ जाऊं।


और अब समय आ गया था अब चाणक्य को लगने लगा कि मुझे ही किसी व्यक्ति को को राजा बनने लायक बनाना होगा चाणक्य का दृढ़ संकल्प आपको इस बात से समझ आएगा कि उन्होंने एक जवान लड़के के प्रति अपना जीवन समर्पित कर दिया था जिसका नाम था चंदू जिसका नाम आगे चलकर पड़ा चंद्रगुप्त मौर्य, इसको उन्होंने तैयार किया; बहुत सारे संस्कार और बहुत सारे शास्त्रों की इनको शिक्षा दी 17 अट्ठारह साल के लड़के को तैयार करके इन्होंने सोचा कि मैं सिकंदर को भारत से उखाड़ फेंक दूंगा चाणक्य को खुद पर भी विश्वास नहीं था लेकिन उनकी एक निष्ठा थी खुद के प्रति कि वह यह कर सकते हैं। चाणक्य चंद्रगुप्त को अच्छी तरह प्रशिक्षित करते चले गए और चंद्रगुप्त उनकी सारी बातें अच्छी तरह मानते चले गए चाणक्य कहते थे कि “शत्रु की दुर्बलता जाने तक उसे अपना मित्र बनाए रखो” फिर चंद्रगुप्त ने पूछा कि सिकंदर को मित्र कैसे बनाएंगे तब चाणक्य ने कहा कि तुम उसकी सेना में शामिल हो जाओ।


किसी प्रकार से चाणक्य ने चंद्रगुप्त को उनकी सेना में मिला दिया और और सिकंदर की सेना का सिपाही बना दिया जिससे कि सिकंदर की सारी जानकारियां अब चाणक्य के पास आने लगी चाणक्य ने सोचा बहुत दूर से यात्रा करती हुई सिकंदर की सेना अब थक चुकी है और बोला अब इन्हें मन से भी थका देंगे और सिकंदर की सेना में अलग-अलग भ्रांतियां फैलाना शुरू कर दी और सिकंदर अभी तक सिंधु नदी पार नहीं कर पाया था भारत में अभी तक ठीक तरह से घुस भी नहीं पाया था, उन्होंने सिकंदर की सेना में भ्रांतियां फैलाई कि हमारे देश भारत के देवी देवता तुमसे नाराज हैं। इन्होंने उनकी सेना में बहुत ही अजीबोगरीब काम कराए कभी-कभी अलग-अलग दिनों में खाने में जहर मिला दिया करते थे, द्वी कंटक नीतियों से छोटे-छोटे आक्रमण करा देते थे, उनका देश का झंडा जो पहाड़ पर था उसे जला देते थे अलग-अलग प्रकार की विश्मक भ्रांतियां फैला देते थे लोगों में कंफ्यूजन ओर उनको आपस में ही लड़वा देते थे, इन्होंने सिकंदर की सेना को धीरे-धीरे खोखला करना शुरू कर दिया था, उनका मनोबल तोड़ना शुरू कर दिया, सिकंदर ज्यादा दिनों तक रुक नहीं पाया और वह भाग गया जबकि अभी वह भारत में पूरी तरह से घुस भी नहीं पाया था, अब इस जीत के बाद चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य को खुद पर बहुत ज्यादा विश्वास हो गया था।


फिर इन्होंने सोचा 5000 हाथी घोड़ों की एक सेना बनाकर मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर हमला कर देते हैं और धनानंद को भी हरा देते हैं इन्हें खुद पर बहुत ज्यादा ही आत्मविश्वास हो गया था, और यही इनके लिए नुकसानदायक हुआ। यह पहुंच तो गए 5000 हाथी घोड़ों की सेना लेकर लेकिन कुछ घंटों में ही धनानंद की सेना ने उन्हें बुरी तरह हरा दिया किसी तरह चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने अपनी जान बचाई और वहां से भाग गए।


चाणक्य में एक बात यह थी कि वह कई बार तकलीफों में आए क्योंकि उनके पास एक बड़ी सेना नहीं थी धनानंद का उस समय सबसे बड़ा साम्राज्य था नंदा वंश का! अब चंद्रगुप्त और चाणक्य ने मिलकर 7 रणनीति बनाई।


पहली नीति

पहले जब चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य धनानंद से युद्ध करने गए थे तो वह सीधे उनसे भिड़ गए थे जिसमें उनकी हार हुई थी और अब उन्होंने यह रणनीति बनाई थी अब बीच से नहीं परिधि से हमला करेंगे परिधि मतलब बाहरी घेरे से अंदर तक हमला करेंगे, इसमें धनानंद के बाहरी घेरे में जिन जिन राज्यों पर उसकी कमजोर पकड़ थी, वही से इन्होंने हमले करने शुरू कर दिए छोटे-छोटे आक्रमण करना शुरु कर दिए फिर दूसरी रणनीति अपनाई।


दूसरी नीति

दूसरी नीति थी विषकन्या- चाणक्य ने विष कन्याओं की टीम तैयार की यह विषकन्या सुंदर लड़कियों की एक सेना थी इन विषकन्या को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जहर दे दे कर उन्हें विषकन्या बना दिया और यह पहली बार हुआ था इससे पहले कभी नहीं हुआ था बहुत से काम चाणक्य ने पहली बार किए थे यह विषकन्या जाती और परिधि के राजाओं को चुंबन देकर उन्हें अपने जहर से मार देती।


तीसरी नीति

इन्होंने अपनी एक जासूसों की सेना बनायी इन्होंने बहुत से लोगों को जासूसी की ट्रेनिंग दी की कैसे वहां जाकर जासूसी कर के वहां की खबर यहां लाकर देना है अब चाणक्य को समझ आ गया था की रणनीति को लेकर ही चलेंगे चाणक्य कहते थे कि कभी भी गुस्से से शत्रुओं के बारे में मत सोचो ऐसा करने से आपकी शत्रुओं को विश्लेषण करने की क्षमता खत्म हो जाएगी।


चौथी नीति

एक अच्छा प्रदर्शन करने वाली सेना तैयार करना, इसके लिए चाणक्य ने वात्सायन मुनि का एक वेश धारण कर लिया क्योंकि वह जानते थे अगर बड़ी सेना बनानी है तो लोगों के मन बुद्धि और आत्मा को जीतना पड़ेगा और चाणक्य वात्स्यायन मुनि के भेष में जगह-जगह जाकर कथा प्रवचन करने लगे और लोगों को यह बताने लगे कि आप चंद्रगुप्त मौर्य की सेना मैं शामिल हो जाओ चाणक्य जानते थे कि लोगों से प्रेम से बात करूंगा तो वह प्रभावित हो जाएंगे प्रभु भावित हो जाएंगे और मेरी कहानी पर विश्वास करके चंद्रगुप्त मौर्य की सेना मैं शामिल हो जाएंगे लोगों की आत्मा, बुद्धि को जीतने के बाद अपनी वाणी की शक्ति से लोगों को प्रभावित करके एक एक करके धीरे-धीरे 8 लाख लोगों की सेना बना दी और यह सेना 4 गुना बढ़ी थी धनानंद की सेना से, इनके पास हाथी घोड़ों की बड़ी सेना और गुड़ सवारों की बड़ी सेना पैदल सैनिकों कि बड़ी सेना थी।


पांचवी नीति

योग्य के आधार पर पद - चाणक्य कहते थे कि केवल योग्य व्यक्तियों को ही आगे बढ़ाएंगे वह कहते थे केवल योग्य व्यक्ति ही आगे बढ़ेगा वह अपनी सेना के प्रशिक्षण केंद्र पर जाकर कहते थे राजा को अपने आसपास के लोग बुद्धिमान और योग्य रखना चाहिए चापलूस लोग नहीं होना चाहिए जो केवल आपकी तारीफ करते रहें चाणक्य कहते थे “दुष्ट व्यक्ति और सांप इन दोनों में से सांप अच्छा है दुर्जन को छोड़ दो, सांप तो बस एक ही बार डसेगा लेकिन दुर्जन व्यक्ति आपको कदम कदम पर डसेगा” इसलिए वह कहते थे मैं एक ऐसी सेना बनाऊंगा जो सक्षम हो जिसमें दुर्जन लोग ना हो।


छठवी नीति

छापामार युद्ध, अब चाणक्य छापामार युद्ध धनानंद की परिधि में करते रहते थे छापामार युद्ध मतलब छोटे-छोटे आक्रमण धनानंद की सेना पर, इससे चाणक्य के सैनिकों की युद्ध करने की क्षमता बढ़ गई क्योंकि वह इतने छोटे-छोटे आक्रमण कर चुके थे कि अब चाणक्य की सेना पूरी तरह सक्षम हो चुकी थी बड़ा युद्ध करने के लिए।


सातवीं नीति

अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का निर्माण, चाणक्य ने अपनी सेना और ताकत को बड़ा कर लिया था चाणक्य ने कश्मीरी प्रवर्तक को भी अपने साथ में लिया और बाहर के कई यूनानी राजाओं को भी अपने साथ में लिया, पोरस का भी साथ लिया और कई समुद्री लुटेरों का भी साथ लिया इतनी बड़ी सेना बनाकर और यह 7 रणनीतियों के साथ आगे बढ़ते चले गए।


फिर एक-एक करके धनानंद के नंद वंश को खत्म कर दिया, धनानन्द ने कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था की उसकी इतनी बुरी तरह से हार होगी कोई उसे इतनी बुरी तरह से हराएगा। धनानन्द प्रजा से सिर्फ कर्ज वसूलता था और उसे अपने मजे के लिए खर्च करता था।

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