मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय - dhyan chand biography in hindi

मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय, आत्मकथा - dhyan chand biography in hindi


मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय - dhyan chand biography in hindi



हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जीवनी - Dhyan chand biography in hindi


मेजर ध्यानचंद भारत के महान हॉकी प्लेयर थे, यह होकी के ऐसे महान प्लेयर थे की इन्हें हॉकी का जादूगर भी कहा जाता था, और इन्हीं की वजह से ही होकी हमारा राष्ट्रीय खेल बना, दुनिया का महान तानाशाह एडोल्फ हिटलर भी इनका खेल देखकर बहुत प्रभावित हुआ था उसने इन्हें अपने आर्मी में आने का आग्रह किया था, तब ध्यानचंद ने कहा था कि "मेरा भारत महान" और मैं कहीं नहीं जाऊंगा। राष्ट्रीय खेल दिवस भी हर साल 29 अगस्त को मेजर ध्यानचंद की जयंती के दिन मनाया जाता है।

प्रारंभिक जीवन - Earlier life

मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1950 में इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था इनकी मां का नाम श्रद्धा सिंह और पिता का नाम समेश्वर सिंह था इनके पिताजी फ़ौज में थे वह ब्रिटिश आर्मी में थे, इनके भाई रूपसिंग थे जो कि भारत के लिए ही हॉकी खेले थे वह भी एक हॉकी प्लेयर थे।

हॉकी की शुरुआत ओर करियर - dhyan chand hockey career


ध्यानचंद का मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था वह हमेशा पेड़ों से लकड़ी को तोड़कर उससे हॉकी खेला करते थे और स्कूल नहीं जाते थे, इसीलिए इनके माता-पिता इनसे बहुत चिंतित रहते थे, तो इनके पिताजी ने सोचा कि पढ़ाई में तो इसका मन नहीं है तो इससे अच्छा होगा इसे आर्मी में ही भेज दिया जाए और मेजर ध्यानचंद ने 16 साल की उम्र में आर्मी जॉइन की जिस समय इन्होंने आर्मी जॉइन कि उस समय प्रथम विश्वयुद्ध खत्म ही हुआ था, लेकिन आर्मी में होते हुए भी हॉकी के लिए इनका प्यार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था इसलिए यह पेड़ों की डालों को तोड़कर सबको बुलाकर हॉकी खेला करते थे, और जब यह एक दिन ऐसे ही पेड़ की डाल को तोड़कर हॉकी खेल रहे थे तब इनके हुनर को रेजीमेंट के हेड बाला तिवारी ने देखा और उन्होंने सोचा यह लड़का पेड़ की लकड़ी से ही इतना अच्छा होकि खेलता है तो अगर इसके हाथ मे हॉकी स्टिक दे दी जाए तो यह तो कमाल ही कर देगा और तभी से उनके हाथ में उन्होंने हॉकी स्टिक पकड़ा दी।

बालक तिवारी ने कहा अब इस लड़के को ट्रेन करेंगे हॉकी के लिए क्योंकि इस लड़के में हॉकी खेलने का अच्छा हुनर है अब ध्यान चंद हॉकी खेलने लगे और उनकी ट्रेनिंग भी चलने लगी है और कुछ ही दिन बाद इंडियन आर्मी की टीम न्यूजीलैंड हॉकी खेलने के लिए गई। यह पहली बार था जब ध्यान चंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने हॉकी खेल का जलवा दिखाने वाले थे उस समय उन्होंने इतना जबरदस्त परफॉर्म किया कि वहां के सारे लोग इंडियन हॉकी के मुरीद हो गए थे, न्यूजीलैंड के अखबारों में बड़ी-बड़ी हेडलाइंस पर यह खबर छपी। ध्यानचंद के साथ लोग फोटो खिंचवाने लगे उनके ऑटोग्राफ लेने लगे और यह एक बड़े ही खिलाड़ी बन गए थे क्योंकि उन्हें बचपन से ही हॉकी खेलने का शौक था और बचपन से यह हॉकी की प्रैक्टिस कर रहे थे। जब ध्यानचंद वापस आए तो एयरपोर्ट पर इनका बहुत ही अच्छे से स्वागत किया गया जब तक ध्यानचंद रिटायर नहीं हुए थे तब तक इंडियन हॉकी टीम ने ऐसा भयानक खेल दिखाया कि लोग खेल देखकर अचंभे में पड़ जाते थे कि यह टीम है या क्या है, और इस समय सबसे ज्यादा गोल ध्यानचंद और उनके भाई रूप सिंह के होते थे।

1924 में पेरिस ओलंपिक में हॉकी को हटा दिया गया था यह ध्यानचंद लिए बहुत बड़ा झटका था न्यूजीलैंड से वापस आने के बाद इन्हें आर्मी में लांस नायक की पोस्ट मिली जब उन्हें यह पोस्ट मिले तो यह पूरी तरह से आर्मी के काम में जुट गए अब हॉकी खेलने का समय नही मिलता तो अंदर ही अंदर यह घुटते जा रहे थे क्योंकि 1924 में हॉकी को ओलम्पिक से हटा दिया गया था इसीलिए। इसी बीच 1926 में ग्वालियर में इंडियन हॉकी फेडरेशन की स्थापना होती है अगर उस वक्त इंडियन हॉकी फेडरेशन की स्थापना नहीं होती तो आज हॉकी ओलंपिक का हिस्सा भी नहीं होता, ओलंपिक में हॉकी को अगर प्राथमिकता मिली है तो उसका श्रेय इंडियन हॉकी फेडरेशन को जाता है।

लेकिन शुरुआत में इस फ़ेडरेशन के पास पैसे नहीं थे, जब इंडियन हॉकी टीम जर्मनी ओलंपिक खेलने जा रही थी तो उनके पास खाने तक को भी पैसे नहीं थे और ब्रिटिश सरकार कहती थी यह "वेस्ट  ऑफ मनी है" इन्हें भेजने से कोई फायदा नहीं।

1926 में पहले तो आर्मी ध्यानचंद को खेलने से मना करती है, लेकिन 1928 में ओलंपिक होने थे और हॉकी वापस ओलंपिक में शामिल हो गया था तो हॉकी के लिए इंडिया की बेस्ट टीम जानी चाहिए थी, पहले तो आर्मी ध्यानचंद को मना करती लेकिन वह बाद में मान जाती है फिर इंडियन हॉकी टीम इंग्लैंड जाती है एम्स्टर्डम समर ओलंपिक्स खेलने और मैच का परिणाम कुछ इस तरह हुआ

डेब्यू मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत  ऑस्ट्रेलिया 6-0,
भारत डेनमार्क 5 - 0, भारत स्वीटजरलैंड 6 - 0, भारत पोलैंड 3 - 0, भारतीय टीम का इस ओलंपिक में इतना शानदार प्रदर्शन था कि विरोधी टीम एक भी गोल नहीं कर पाई थी, खबरें अखबार में छपी कि यह जादूगर कौन आ गया है और ध्यानचंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेमस हो चुके थे उन्हें इस ओलंपिक से बहुत ज्यादा प्रसिद्धि मिली और भारतीय हॉकी टीम को एक अलग ही लेवल पर पहुंचा गई थी

ओर जब इस ओलंपिक से लौट कर वो वापस भारत आए तो कई लोग उनके स्वागत में खड़े थे और यह देखकर ध्यानचंद गदगद हो गए क्योंकि ध्यानचंद वर्ल्ड कप जीत कर लाए थे ओर एक गोल्ड मेडल जीतकर लाये थे।

अब बारी थी अगले ओलंपिक की 1932 के ओलंपिक जिसके लिए भारत को अमेरिका सैन फ्रांसिस्को जाना था, क्योंकि उस समय भारतीय हॉकी फेडरेशन के पास पैसे ही नहीं थे और ब्रिटिश सरकार भी मदद नहीं कर रही थी ब्रिटिश सरकार ने कहा वहां जाने के लिए तो 2 गुना खर्चा होगा हम इतना खर्चा नहीं कर सकते क्यों फालतू में अपने पैसे लगाएं।अभी यहाँ बहुत बड़ी दिक्कत हो गई थी पैसों की और इस समय भारतीय हॉकी टीम ने पंजाब नेशनल बैंक से लोन लिया था, और यह लोन भी कम पड़ रहा था तब बंगाल फेडरेशन ने मदद की और इंडियन हॉकी टीम सैन फ्रांसिस्को अमेरिका के लिए रवाना हुई।

वहां पहुंचने के बाद 4 अगस्त 1932 को मैच हुआ पहला मैच जापान के खिलाफ था तब स्कोर था भारत जापान 11 - 1, उसके बाद फिर फाइनल में अमेरिका के खिलाफ स्कोर था 24 - 1 यह एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है और ध्यानचंद एक बार फिर गोल्ड मेडल ले आए थे,लेकिन इस मैच को जीतने से जितना पैसा आया था उसके बाद भी यह पंजाब नेशनल बैंक का लोन नहीं चुका पाए थे क्योंकि उस समय पैसों की भारी तंगी थी।

और इसके बाद और भी कई मैच खेले गए और जब तक इस मैच का सेशन खत्म होता है तब तक कुल 36 मैच खेले गए थे इसमें भारत 34 में जीता था एक मैच हारा था और दो मैच ड्रॉप हुए थे और ध्यानचंद को उस समय स्टार ऑफ इंडियन हॉकी का टाइटल दिया गया था

और अब समय आ गया था जर्मन ओलंपिक्स का और वह समय हिटलर का था हिटलर के समय में ही ओलंपिक्स हुए थे हिटलर ने अपने आप को अच्छा दिखाने के लिए ओलंपिक्स करवाए थे 17 जुलाई को यहां मैच था मैच शुरू हुआ और भारत ने बहुत सीरियसली उस मैच को नहीं लिया और भारत 1 - 4 से हार गया उसके बाद पूरी भारतीय टीम का मनोबल थोड़ा टूट गया था फिर दूसरे दिन ध्यानचंद ने तुरंत ही आपातकालीन मीटिंग बुलाई और देखा कि क्या-क्या समस्याएं आ रही है और तुरंत ही अली दारा को फ्लाइट से बुलाया गया। इसके बाद जो सफर भारत ने जर्मन ओलंपिक्स में शुरू किया पहला मैच हंगरी के खिलाफ खेला भारत हंगरी 4 - 0, भारत अमेरिका 7 - 0, भारत जापान 9 - 0, भारत फ्रांस 10 - 0 भारत का प्रदर्शन इतना शानदार था पूरा जर्मनी हैरान रह गया अब फाइनल मैच आया जर्मनी के खिलाफ और यहां जर्मनी ने बहुत बड़ी चालाकी की जर्मनी ने यह कहा कि हम अपनी ओरिजिनल टीम लेकर आएंगे।
जब भारत जर्मनी से पहले मैच हारा था तब वह अभ्यास मैच था वह जर्मनी की B टीम थी, लेकिन जर्मनी की जो सीनियर ओरिजिनल टीम थी वह अलग थी अब फाइनल में सीनियर टीम को उतरना था लेकिन जर्मनी ने इसी B टीम को फाइनल में उतार दिया और इससे ध्यानचंद बहुत गुस्सा हुए थे।
भारतीय टीम फिर मैदान में उतरी, फर्स्ट हाफ में ही इंडियन टीम को पता चल गया था कि जर्मनी को हराना इतना आसान नहीं है फर्स्ट हाफ़ में एक से दो गोल ही मारे थे लेकिन उसके बाद जब सेकंड हाफ आया तब भारतीय टीम ने लगातार छह गोल मार दिये, इससे जर्मनी की हॉकी टीम गुस्सागई और ध्यानचंद बोल लेकर गोल की तरफ बढ़ते हैं इतने में जर्मनी का गोलकीपर ध्यानचंद को हॉकी स्टिक मार देता है जिस से ध्यानचंद का दांत टूट जाता है।

भारतीय टीम कहती है हम भी ईट का जवाब पत्थर से देंगे छोड़ेंगे नहीं किसी को तब ध्यानचंद ने कहा अगर हमने भी ऐसा किया तो उनमें और हम में फर्क ही क्या रह जाएगा खेल भावना हमेशा सही रहनी चाहिए।

और उसके बाद तो ध्यानचंद ने ऐसा खेल खेला ऐसा नाक में दम किया जर्मनी के कि पूरा का पूरा मैदान हंसने लगा था जर्मन टीम को देखकर और उनको उनके किए की सजा भी मिल गई थी पूरे के पूरे 8 गोल मारे थे भारतीय टीम ने फिर मेडल जीत लिया और हिटलर भी यह मैच बैठ कर देख रहे थे और चुपचाप वहां से उठकर चले गए। शाम को मीटिंग थी और हिटलर ध्यानचंद से मिलता है तो ध्यानचंद से कहता है कि तुम क्या काम करते हो वहां पर तो ध्यानचंद कहते हैं कि मैं आर्मी में हूं तो हिटलर बोलता है कि तुम हमारी जर्मन आर्मी में आ जाओ हम तुम्हें बहुत ऊंचा दर्जा देंगे तुम बहुत कमाल के प्लेयर हो तो ध्यानचंद ने इस बात को सीधा नकार दिया उन्होंने कहा मैं यह बिल्कुल भी नहीं करूंगा।

जब इस ओलंपिक के बाद भारतीय टीम एयरपोर्ट पर आती है सिर्फ दो से 3 लोग रहते हैं उनका स्वागत करने के लिए आते हैं यह देखकर पूरी भारतीय टीम को बहुत बुरा लगता है
इसके बाद हॉकी खेल इतना लोकप्रिय हो गया था उस समय जैसे आज घर-घर में क्रिकेट खेला जाता है वैसे ही उस समय होगी खेला जाता था।

ध्यानचंद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी को 1948 तक खेलते रहे 42 साल की उम्र मैं उन्होंने हॉकी से रिटायरमेंट ले लिया।

ध्यानचंद की मृत्यु - dhyan chand death


ध्यानचंद के आखिरी दिन बहुत ही आर्थिक तंगी में गुजरे ओलंपिक मैचों में इतने स्वर्ण पदक दिलाने के बाद भी सरकार की तरफ से उनकी कोई मदद नहीं की गई वह बहुत परेशान रहने लगे थे उन्हें लीवर का कैंसर भी हो गया था उन्हें दिल्ली के हॉस्पिटल में जनरल वार्ड में रखा गया था 3 दिसंबर 1979 में उनकी मृत्यु हो गई।

मेजर ध्यानचंद के बारे में रोचक तथ्य - mejor dhyan chand interesting facts hindi


• मेजर ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था वह रात के समय चंद्रमा की रोशनी में ही प्रैक्टिस किया करते थे इसलिए उनके दोस्त ने उनके नाम के आगे चंद लगा दिया था।

• ध्यानचंद 16 साल की उम्र में आर्मी में सिपाही के रूप में नियुक्त हुए थे लेकिन वह भारतीय सेना में मेजर के पद तक गए।

• मेजर ध्यानचंद हॉकी बॉल को इतनी शानदार तरीके से नियंत्रण में लेते थे कि एक बार नीदरलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक को तोड़ कर देखा गया कहीं उसमें कोई चुंबक तो नहीं है लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा क्योंकि जादू उनकी स्टिक में नहीं उनके हाथों में था।

• ऑस्ट्रेलिया के एक महान क्रिकेटर ब्रैडमैन ने ध्यानचंद के बारे में कहा था “ध्यानचंद इस तरह से गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनता है”

• मेजर ध्यानचंद ने जब एक बार गोल मारा तो वह पोल पर जाकर लगा फिर उन्होंने कहा इस गोल पोस्ट की चौड़ाई कम है, फिर जब गोल पोस्ट की चौड़ाई नापी गई तो वाकई में वह कम थी।

• हिटलर ने मेजर ध्यानचंद से कहा था आप हमारी आर्मी में शामिल हो जाओ और हमार देश लिए होकि खेलो, मैं तुम्हें जर्मन आर्मी में मार्शल बना दूंगा, मेजर ध्यानचंद ने कहा मेरा देश भारत है और मैं सिर्फ उसी के लिए खेलूंगा।

• अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में मेजर ध्यानचंद ने 400 से अधिक गोल किए।

• मेजर ध्यानचंद को बॉक्सिंग में मोहम्मद अली, क्रिकेट में ब्रैडमैन, और फुटबॉल में पेले के बराबरी का दर्जा प्राप्त है।

• मेजर ध्यानचंद ने वर्ष 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक खेलों में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

• भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से 1956 में ध्यानचंद को सम्मानित किया गया।

मेजर ध्यानचंद से संबंधित कुछ सवाल व जवाब

• मेजर ध्यानचंद स्टेडियम कहाँ है?

➡ मेजर ध्यानचंद स्टेडियम नई दिल्ली में है। इसका नाम प्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाडी़ मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखा गया है।

• मेजर ध्यानचंद पुरस्कार

➡ ध्यानचंद पुरस्कार अपने शानदार खेल में खेल-कूद के क्षेत्र में योगदान करने और सक्रिय खेल जीवन से अवकाश प्राप्त करने के बाद भी खेल-कूद को बढ़ावा देने के लिए योगदान जारी रखने के लिए दिया जाता है।

2002 में हुई थी पुरस्कारों की शुरुआत

मेजर ध्यानचंद पुरस्कार की राशि
मेजर ध्यानचंद पुरस्कार का प्राप्त करने वाले विजेताओं को इस पुरस्कार के साथ-साथ 5 लाख रूपये की नकद राशि भी प्रदान की जाती है। इसके साथ ही विजेताओं को एक प्रतिमा, प्रमाण पत्र और औपचारिक पोषण मिलती है।

• सेवानिवृत्ति के बाद ध्यानचंद राजस्थान के कौन से कैंप में कोच थे?

➡1956 में सेना से मेजर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद ध्यानचंद हॉकी कोच के तौर पर राजस्थान के माउंट आबू चले गए



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