सोइचिरो हौंडा 16 की उम्र में पढ़ाई छोड़े मैकेनिक का काम किया बाद में बने हौंडा मोटर्स के मालिक | motivational success story in hindi

सोइचिरो हौंडा के संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी | motivational success story in hindi


सोइचिरो हौंडा के संघर्ष और सफलता की प्रेरणादायक कहानी | motivational success story in hindi



दोस्तों आज हम आपको सोइचिरो हौंडा के जीवन की प्रेरणादायक कहानी (motivational success story in hindi)  बताने जा रहे हैं की कैसे उनके घर की आर्थिक  स्थिति ठीक ना होंने के बावजूद भी संंघर्ष करते हुए हौंडा कंपनी के मालिक बने तो चलिए पढ़ते हैं motivational story in hindi

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सोइचिरो होंडा का जन्म जापान के एक छोटे से गांव शिजुओका में हुआ था पिता एक गरीब लोहार थे वे पुरानी टूटी हुई साइकिल खरीद कर उन्हें ठीक करके बेचते थे सोइचिरो को शुरू से औजारों से खेलने का शौक था वे काम में अपने पिता का हाथ बटाया करते थे होंडा को पढ़ाई लिखाई पसंद नहीं थी यही वजह रही कि उन्होंने 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी। एक दिन उन्होंने अखबार में ' शोकई 'कार कंपनी में मैकेनिक की नौकरी का प्रस्ताव देखा और टोक्यो चले गए। उन्हें काम तो मिल गया लेकिन उनकी उम्र को देखते हुए केवल साफ सफाई का काम ही दिया वह उस छोटी सी कंपनी में सबसे कम उम्र के कर्मचारी थे। उन्होंने उस कंपनी के मालिक से निवेदन किया कि उन्हें मैकेनिक का काम सीखने दिया जाए उनके निवेदन को स्वीकार करते हुए कंपनी के मालिक ने उन्हें दूसरी ब्रांच में भेज दिया यहां रात को रेसिंग कार तैयार की जाती थी से सोइचिरो अपनी मेहनत और लगन से काम करने लगे और बहुत ही जल्द एक उम्दा मैकेनिक बन गए। (motivational success story in hindi)


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एक बार शोकाई कंपनी की कार ने पांचवी जापान कार चैंपियनशिप में हिस्सा लिया यह सभी कारों को पीछे छोड़ते हुए रेस में प्रथम आई सोइचिरो ही इस जीतने वाली कार के मैकेनिक थे जीत के बाद यह टोक्यो की पसंदीदा कार बन गई अब कंपनी की कई शाखाएं खुल गई इन शाखाओं में एक जिम्मेदारी सोइचिरो को दी गई कुछ समय बाद सोइचिरो ने कंपनी छोड़ दी और घर वापस आ गए यहां वे मैकेनिक का काम करने लगे कुछ दिनों बाद उन्होंने बड़ी कंपनी के लिए सस्ते और टिकाऊ पिस्टन रिंग्स बनाने शुरू किए उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगाकर एक कंपनी खोली और प्रयोग शुरू कर दिए।

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अपने बनाए पिस्टन को बेचने के लिए बड़ी कंपनियों से संपर्क शुरू किया जल्द ही उन्हें टोयोटा को पिस्टन रिंग्स सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट मिला लेकिन इस बीच एक रेस के दौरान उनका एक्सीडेंट हो गया और वह बुरी तरह जख्मी हो गए और उन्हें 3 महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा अस्पताल में उन्हें पता चला कि उनके बनाए पिस्टन की क्वालिटी तय मानकों के अनुसार पास नहीं हुई है उन्होंने टोयोटा का कॉन्ट्रैक्ट खो दिया। जीवन में सब उनके खिलाफ चल रहा था उनकी पूरी कमाई डूब चुकी थी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और पिस्टन की क्वालिटी को ठीक करने के लिए कई कंपनियों के मालिकों से मिले लेकिन तभी एक और आफत आ गई 1944 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी हमले में उनकी फैक्ट्री पूरी तरह जल गई।


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इस घटना ने उन्हें दहला दिया था लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद उन्होंने अपनी कंपनी के बचे अवशेषों को 4,50,000 येन में बेचा और अक्टूबर 1946 में उन्हें पैसों से हौंडा टेक्निकल रिसर्च इंस्टीट्यूट खोलो। युद्ध में हारने के बाद जापान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह डगमगा गई थी लोग पैदल या साइकिल से चलने को मजबूर थे इन समस्याओं को देखते हुए उन्होंने एक छोटा इंजन बनाकर साइकिल से जोड़ दिया उनका यह कॉन्सेप्ट लोगों को पसंद आया और उनकी बाइक बिकने लगी यहीं से उनकी सफलता (motivational success story ) शुरू हुई।

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1949 में उन्होंने हौंडा टेक्निकल रिसर्च इंस्टिट्यूट का नाम बदलकर होंडा मोटर्स रख दिया इसी साल उन्होंने टू स्ट्रोक इंजन बाइक लॉन्च की इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा कंपनी 1961 में हर साल एक लाख मोटरसाइकिलो का उत्पादन करने लगी 1968 में कंपनी के हर महीने का उत्पादन बढ़कर 10,00,000 मोटरसाइकिल हो गया जापान की अर्थव्यवस्था सुधरी और होंडा ने फोर व्हीलर्स में कदम रखा। वे छोटे कर्मचारियों को भी बड़े अधिकारियों की तरह सम्मान देते थे अपार सफलताओं के बाद 5 अगस्त 1991 को सोइचिरो का निधन हो गया।