बचपन मे माँ के साथ चूड़ियाँ बेचीं आज है IAS अफसर | motivational success story of IAS Ramesh Gholap in hindi

IAS रमेश घोलप के संघर्ष की कहानी



"बचपन में मां के साथ बेचते थे चूड़ी, IAS बनने के बाद ही लौटे अपने गांव"
रांची/धनबाद।


IAS Ramesh Gholap
IAS Ramesh Gholap


'चूड़ी ले लो...चूड़ी...' चूड़ी बेचने वाली यह आवाज कभी गांव की गलियों में हर दिन सुनाई पड़ती थी। पहले मां आवाज लगाती और फिर उनका पुत्र बार-बार इसे दोहरा कर खरीदार जुटाता। 10 साल की उम्र तक मां के साथ चूड़ी बेचने वाले उस बच्चे ने कमाल कर दिखाया। उस बच्चे की पहचान आज आईएएस रमेश घोलप के रूप में सबके सामने है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिला के वारसी तहसील स्थित उसके गांव 'महागांव' में रमेश की संघर्ष की कहानी हर जुबान पर है।




इन्होंने अभाव के बीच ना सिर्फ आईएएस बनने का सपना देखा, बल्कि इसे अपनी मेहनत से सच भी कर दिखाया। काम किया, रुपए जुटाए और फिर पढ़ा। कलेक्टर बनने का सपना आंखों में संजोए रमेश पुणे पहुंचे। पहले प्रयास में विफल रहे, पर वे डटे रहे। साल 2011 में पुन: यूपीएससी की परीक्षा दी। इसमें रमेश 287वां स्थान प्राप्त कर आईएसएस बन चुके थे। पर खुशी तब दोगुनी हो गई, जब वे स्टेट सर्विस की परीक्षा में राज्य में प्रथम आ गए।


 बचपन 



दिन में चूड़ी बेचते, रात में पढ़ते
दिन भर चूड़ी बेचने के बाद जो पैसे जमा होते थे, उसे उनकेे पिताजी अपनी शराब पर खर्च कर देते थे। रहने के लिए ना घर था और पढ़ने के लिए ना पैसे। मौसी के इंदिरा आवास में ही वह रहते थे। मैट्रिक परीक्षा से एक माह पूर्व ही उनके पिता का निधन हो गया। इस सदमे ने उन्हें झकझोरा दिया। फिर भी उन्होने विपरीत हालात में मैट्रिक परीक्षा दी और 88.50% अंक हासिल किये।


पहली बार नोकरी



शिक्षक बना, मिला नया लक्ष्य
उन्होंने 2005 में इंटर पास किया और 2008 में डिप्लोमा करके शिक्षक की नौकरी की। यहां शिक्षकों के आंदोलन का नेतृत्व किया। आंदोलन करते हुए मांग पत्र देने तहसीलदार के पास जाते थे। बस इसी ने मन में कौतुहल मचा दी। आखिर ऐसा क्यों कि कोई तहसीलदार और मैं सिर्फ एक शिक्षक। तभी से उन्होंने तहसीलदार बनने की ठान ली।


संघर्ष 



गाय खरीदने के लिए मिले ऋण से पढे।
मां को सामूहिक ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर 18 हजार ऋण मिला था। इस राशि ने उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने में मदद की। इसे लेकर वह तहसीलदार की पढ़ाई करने निकल जाया करते थे। बाद में इसी रुपए से उन्होंनेे आईएएस की पढ़ाई की। दीवारों पर नेताओं की घोषणाओं, दुकानों का प्रचार व़ शादी की पेंटिंग कर पढ़ाई के पैसे की व्यवस्था करते थे।


जिद



अफसर बन कर ही लौटे अपने गांव उन्होंने वर्ष 2010 में अपनी मां को पंचायत के मुखिया के चुनाव में खड़ा किया। उन्हें लगता था जीत उनकी होगी, पर उनकी मां हार गई थी। इस हार के बाद उन्होंने गांव छोड़ने का निर्णय किया। उन्होंने तय कर लिया कि अब इस गांव में तभी आऊंगा, जब अफसर बन जाऊंगा। 4 मई 2012 को अफसर बनकर पहली बार गांव पहुंचे। जहां उनका जोरदार स्वागत हुआ।


 उनके द्वारा दिया गया संदेश



टैलेंट है तो कोई नहीं रोक सकता।
मैंने गरीबी में बचपन गुजारा है। गरीबी को अच्छी तरह जानता हूं। मुझे लगा कि व्यवस्था को दो ही रास्ते पर चल कर बदला जा सकता है। पहला राजनीति में जाकर या फिर प्रशासनिक क्षेत्र में आकर। राजनीति में जाना सबके लिए संभव नहीं। यहां परिवार और समाज देखा जाता है जबकि प्रशासनिक क्षेत्र में ऐसा नहीं है। यहां टैलेंट बोलता है। अगर टैलेंट है, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।